अनुभूति एक मात्र सत्य है। अनुभूति में आया हुआ कोई भी विषय तथ्य मनुष्य को किसी अन्य साक्ष्य के लिए विवश नहीं करता। इसलिए हमारे ब्रह्मऋषियों ने वैदिक काल से ही दर्शन को महत्व दिया। दर्शन अर्थात ऐसा मैं प्रत्यक्ष स्वयं अनुभव कर रहा हूँ। मेरे सामने हो रहा या मुझमें गठित हो रहा है। चेतना की प्रयोगशाला में अनुभूति शब्द ही वह एक मात्र साम्राज्य है, जहाँ सब कुछ घटता है, जो इंद्रियों की सीमाओं से कहीं परे हैं, जहाँ सामान्य आँखें, नासिका, कान और स्पर्श पहुँचने में पूर्णत: अक्षम हैं, वहाँ अंतर जगत की अनुभूतियाँ उसकी गहराइयों की टोह लेती हैं और ऐसे अनुभव प्राप्त करती हैं, जिन्हें शब्दों की सीमाओं में बांध पाना प्रायः असंभव सा हो जाता है। अनुभूतियाँ एक ऐसे आकर्षण से युक्त होती हैं, जो मनुष्य को बार-बार उसे अनुभव करने के लिए विवश करता है, भले ही बाहरी जगत में उनकी परिभाषा-व्याख्या असंभव सी प्रतीत होती है। यही वह कारण है जिसने अनजाने काल से आज तक साधकों को कष्ट, संयम रूपी तप के होने पर भी विवश किया कि वो अध्यात्म पथ के मार्ग पर आरूढ़ हो और अपने इस जीवन के अंतिम लक्ष्य आत्म साक्षात्कार के प्रति सदैव प्रेरित बने रहे।
अनुभूति ही वह परम सत्य है, जिसकी यात्रा हेतु साधक नाना प्रकार के आयोजन रचते हैं। लगभग 24 वर्ष पूर्व अनुभूति प्रवास इसी प्रकार के उद्देश्य की पूर्ति हेतु रचा गया था। माँ गंगा की गोद, पिता हिमालय की छाया, हिमालय के गर्भ में ऋषिकेश। यूँ कहने को तो हिमालय का गर्भ बहुत गूढ़ और भीतर है, पर हम आध्यात्मिक दृष्टि से कह सकते हैं कि जहाँ गंगा और हिमालय दोनों साथ-साथ उपस्थित उपलब्ध हैं सहजता से, वह ही हमारे लिए हिमालय का गर्भ है। वहीं पर 24 वर्ष पूर्व प्रथम अनुभूति प्रवास का आयोजन हुआ। 7 दिनों के लिए साधकों का मिलना, गहरी आध्यात्मिक साधनाओं में माँ गंगा के किनारे डूब जाना, उसके किनारे पर ही उपलब्ध प्रांगण में बैठ कर के अनेकों वेदांत दर्शन के और गहरे गूढ़ विषयों का अध्ययन करना, जो आत्म उत्कर्ष के लिए एक ऐसी स्मृति बन जाए कि पूरा वर्ष उसे फीका न कर पाए। यह प्रयास अनुभूति प्रवास के नाम से गत 24 वर्षों से करते आए हैं। दिनचर्या साधकों की साधना की दृष्टि से रहती है। प्रातः उठने के उपरांत ध्यान की अवधि के लगभग 2-ढाई घंटे उस गहराई में गोता दिलाते हैं, जहाँ सामूहिक स्वरूप में बैठ करके ऐसी तरंगों को उत्पन्न किया जाता है, जहाँ एक साधक दूसरे की पूर्ति का कारण बन बैठता है।
सामूहिक स्वरूप में बैठकर की गई साधनाएँ बहुत बड़े लाभ का स्रोत बन जाती हैं। फिर वहीं उन साधनाओं को आगे और गहराई तक पहुँचाने के लिए कुछ गूढ़ साधनाओं में जाने हेतु माँ गंगा के प्रत्यक्ष किनारे पर बैठ कर सैकड़ों साधक डूब जाते हैं। और अपने अंतर जगत में माँ गंगा के पावन वातावरण में, वहाँ सूक्ष्म दिव्य शक्तियों के संरक्षण में उस अतुलनीय लाभ को प्राप्त करते हैं, जो अन्यथा और कहीं सहजता से उपलब्ध हो पाना असंभव सा है। एक जैसी विचारधारा वाले साधक सजातीय वातावरण में एक दूसरे को पुष्ट करते हैं और एक साथ सुपाच्य स्वरस भोजन प्राप्त करना। अनुशासन के अंतर्गत रहना, अध्ययन की प्रयोगशाला में अपने अध्यापक के साथ लीनता से अध्ययन करना, प्रश्नोत्तर काल में अपने मन में बैठी जिज्ञासाओं को व्यक्त करना और भजन संध्या जैसे कार्यक्रमों में स्वयं को ईश्वरीय भक्ति में विलीन कर डालना। बीच में समय प्राप्त कर निकट के किसी ऐसे तीर्थ पर जाना, जहाँ जाकर के कुछ ऐसी स्मृतियाँ सजीव हो जाएँ, जो न जाने किसी काल में, किसी अन्य जन्म में प्राप्त की होंगी अथवा ऐसी स्मृतियाँ जिनकी रचना आने वाले जीवन पर्यंत तक कभी मिटने वाली नहीं है। ये सब कुछ उस अनुभूति प्रवास के अंतर्गत ही चलता है। जहाँ भी साधक विचरते हैं, जहाँ भी घूमते हैं, जहाँ भी उठते-बैठते बात करते हैं, भीतर एक अद्भुत सा आनंद, एक मस्ती में ओतप्रोत रहते हैं।
माँ गंगा के पूजन का भी एक अवसर प्राप्त होता है, जहाँ टिमटिमाते दीपकों की साक्षी में माँ गंगा की आरती-आराधना करने का मंत्रोच्चारण सहित एक अवसर प्राप्त होता है। 7 दिन कहाँ गए, इसका आभास किसी को नहीं हो पाता। कोई भी नहीं जो वहाँ से जाना चाहता हो, सब चाहते हैं कि ऐसा संभव हो कि बाकी का बचा शेष जीवन यूँ ही इसी प्रकार इस रूप में मग्न होकर, मस्त होकर ही सारा व्यतीत हो जाए। पर जीवन के संग्राम के मोर्चे की अपनी आवश्यकताएँ हैं, वहाँ से विदाई होती है। विदाई लेकर नए उत्साह, नए उमंग, नए संकल्प के साथ संचालित होकर के साधक पुन: वहाँ से विसर्जन प्राप्त करते हैं, पर "पुनरागमनाय च" का मंत्र उनमें गुंजायमान होता रहता है। पुनरागमनाय! इस बार भी अनुभूति प्रवास में सभी का आवाहन है। इस बार भी गूढ़ साधनाओं की डुबकी लगाने के लिए फिर से स्वर्णिम अवसर मिलेगा। इस बार भी कुछ ऐसा अध्ययन करने को मिलेगा, जिसकी स्मृतियाँ वर्ष भर नहीं जाने वाली, जो उसी प्रकार सजीव रहेंगी जैसे माँ गंगा के तट, पिता हिमालय के संरक्षण में हमने उन्हें प्राप्त किया था। आओ, तुम्हारा आवाहन है।