
ब्रह्म तेज के सुनहरे प्रकाश का ध्यान करते हुए भीतर की भाव क्षमता इतनी अधिक प्रबल होने लगती है की नेत्रों से मस्तक और मस्तक से पूरे मस्तिष्क में मानों एक अमृतमयी संजीवनी का संचार होने लगा हो। ऐसी ऊर्जा का संचार वर्षों से थके मांदे मस्तिष्क के रोम रोम को गहरा विश्राम और वर्षों से एकत्रित निर्जीवता से मुक्त करा देता है। अधिकांश साधक इस अवस्था में आते आते अनेकों बार उबासी अर्थात जम्हाई लेते हुए देखे जाते हैं। इस अवस्था में उबासी लेना सीधे मस्तिष्क को प्राण द्वारा अभिसिंचित करता है।
सत्य तो यही है की हमें हमारा अपना भी पूर्ण बोध नहीं रहता है। हमें केवल थकावट - झल्लाहट और अस्थिरता जैसे प्रभाव की बतलाते हैं की हमारे अस्तित्व की गहराई में कुछ छूट रहा है। इस प्रकार की ध्यान साधना का ब्रह्म मुहूर्त के क्षणों में किया गया प्रयोग ऐसे समस्त कारणों को समाप्त करता है। केवल सुनने और अनुभव करने में आकाश और पाताल का भेद है। अतः इस अद्भुत अनुभव को प्राप्त करने हेतु प्रातः साधकों को स्वयं ही उपस्थित रहना होगा।
अब इसी ब्रह्म तेज रूपी सुनहरे प्रकाश के ध्यान को कपाल से लेकर नीचे के शरीर में भी अवतरित किया जायेगा। जिसके अंतर्गत रीढ़ अर्थात मेरुदंड में एक विशेष प्राण संचार की अनुभूति साधकों को रहेगी। रीढ़ मार्ग में प्राण का संचार और प्रवाह जैसे जैसे बढ़ने लगता है वैसे वैसे साधक को अनायास ही एक उल्लसित करने वाली ऊर्जा अनुभूति अपने भीतर होने लगती है। अनुशासित भाव से इस ध्यान में स्वयं को जुटाए रखना। आपको यह अनुभव स्थायी रूप से उत्कर्ष प्रदान करे इसी लिए यह वर्तमान ब्रह्म तेज के इस सुनहरे प्रकाश का ध्यान हम आने वाले अनेक सप्ताह तक करवाते ही रहेंगें। इसका लाभ अन्य को भी देने हेतु आप उन्हें इसके अनुशासन में आने का सुझाव दे सकते हैं। यात्रा मंगलमयी और उत्कर्ष से भरी रहे।