प्रस्तावना — अस्तित्व का केंद्र

समझ का भेद मनुष्य को अर्थ से अनर्थ की ओर भी धकेल सकता है और यह बात शब्दों के अर्थ से अधि क शब्दों के मर्म से सम्बंधित है। सरलता से समझें तो शब्द अनेक मर्म को वहन करते हैं भले ही उनका शाब्दि क अर्थ सर्वथा भिन्न ही क्यों न रहे। छोटा सा उदाहरण इस भाव को स्पष्ट करता है।

"यह हमारे गुरु जी हैं"

"यह बड़ा गुरु आदमी है"

यहाँ शब्द "गुरु" एक ही है पर दोनों वा क्यों में जो भा व रूपी मर्म है उसमें आकाश पाताल का भेद है। एक में सहज श्रद्धा और सम्मान का निरूपण है और दूसरे में प्रपञ्च की गंधव्याप्त है।

कुछ इसी प्रकार का सत्य अहंकार शब्द के साथ भी हुआ है। एक ऐसी महाशक्ति जिसके द्वारा मनुष्य न केवल लौकिक अपितु पर अलौकिक उद्देश्य जैसे आत्मनो मो क्षार्थ को प्राप्त कर जाता है, सभी इसी अहंकार की महाशक्ति पर ही आधारित हैं। यूँ कहें की ब्रह्मऋषियों के पर उत्कर्ष का साधन और भस्मासुर के विनाश का स्त्रोत एक ही महाशक्ति है। वह महाशक्ति है अहंकार। इस छोटी सी पुस्तक में उसी मर्म को स्पष्ट करने का प्रयास किया है।

- दिनेश कुमार

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