अद्भुत स्थिरता शांति की अनुभूति आत्मा की निकटता का परिणाम

अद्भुत स्थिरता शांति की अनुभूति आत्मा की निकटता का परिणाम

 

ध्यान साधना में जब मनुष्य भीतर की सजगता जब अनुभव करने उतरे तो प्राथमिक परिचय एक अद्भुत स्थिरता और शांति से होता है। आनंद तो उसकी फलअश्रुति है पर प्रथम परिचय एक अद्भुत स्थिरता और शांति से ही होता है।  साधकों को आज के इस ध्यान में उसका बोध पूर्ण अथवा आंशिक रूप में आपने ध्यान के उत्तरार्ध में यह अनुभव अवश्य किया होगा।  उस अद्भुत स्थिरता और शांति के अंश कम यां अधिक हो सकते हैं। किसी साधक ने पूर्ण तो किसी साधक ने आंशिक अनुभव प्राप्त किया होगा।  और कोई कोई साधक मस्तिष्क में पूर्व से ग्रसित किसी विचार से बहुत विचलित होगा, और उससे बाहर नहीं निकल पाया होगा तो संभव है की वह स्थिरता और शांति को अपने भीतर अनुभव करने में चूक गया हो। पर यह सत्य है कि आंशिक अनुभव अवश्य किया होगा। और यह अद्भुत स्थिरता, अद्भुत शांति जिसे बटोरने के उपरांत, हालांकि वह केवल एक झलक मात्र ही होती है, उससे अधिक अभी नहीं। 


(आनंद का उल्लेख नहीं करूंगा आनंद कई बार अधिक ले लिया जाए तो मन कर रंजन भी बन जाता है क्योंकि जिस आनंद की चर्चा अध्यात्म के गहरे प्रकोष्ठ में होती है वह कुछ और ही है, यहां तो आनंद कई बार मजे के साथ भी जोड़ दिया जाता है) पर इसमें भी कोई संदेह नहीं की सामान्य साधना में भी जो स्थिरता और शांति को अनुभव करते हैं वह अपना प्रभाव छोड़ जाती है।  युक्ति-युक्त विज्ञानमय  में कोष की साधना में तो इस अनुभव का बहुत अधिक विस्तार हो जाता है। पर यहाँ अभी मैं केंद्रित रहना चाहता हूं केवल उस भाव पर जो भीतर की सजगता अनुभव करते ही, भीतर की चैतन्यता अनुभव करते ही एक हल्का सा हिलोरा भीतर अनुभव होता है. इस Swing में शरीर से चेतना कुछ क्षणों लिए कुछ ही अंशों में अलग होती है, और वह भीतर एक झूला, एक हल्का सा भीतर आता है। 


साधक को ऐसा लगता है जैसे मैं भीतर हिलडुल रहा हूं, यह शरीर से उत्पन्न हुई एक आंशिक अस्थाई अर्थात Transient  उत्पन्न हुई अवस्था है।  इस आंतरिक पृथकता की अनुभूति ही साधक को एक बड़ी विचित्र सी स्थिरता और शांति में डूबा जाती है। बाहर आने का ध्यान से मन नहीं करता है, जी करता है की इसी प्रकार बैठे और बने रहें। ऐसा क्यों अनुभव होता है? ऐसा इसलिए अनुभव होता है चूँकि उस समय साधक अपने भीतर जीवात्मा की अनुभूति का प्राथमिक स्तर की निकटता में अनुभव करता है।  भले ही वह प्राथमिक, Primary निकटता का अनुभव मनुष्य को सर्वप्रथम एक अद्भुत स्थिरता और शांति को देता है, उसका आभास देता है।  एक विचित्र सी नीरवता भीतर स्थापित होती है। उसकी फलअश्रुति बाद में अनुवाद करते हुए आनंद - Ecstacy  आदि के रूप में हम अभिव्यक्ति करते हैं। 


उन क्षणों में जो वह अनुभूति होती हो इसकी चर्चा आज यहां क्यों कर रहा हूं, उसके उल्लेख करने का यहां उद्देश्य क्या है ? आत्म साक्षात्कार तो प्रत्येक साधक का उद्देश्य ही है। पर आज इसका उल्लेख मैंने यहाँ इसलिए किया, क्योंकि यह जो अस्थाई Transient स्थिरता और शांति है, यह बहुत बड़े अंशों में मनुष्य के मस्तिष्क की क्षमताओं को स्पंदित एवं जागृत करने में सक्षम है। वह मस्तिष्क जो वर्षों से उहापोह, उथल-पुथल में व्याप्त और लिप्त रहता है, उसे  गहरे ध्यान के अनुभव द्वारा एक अवसर प्राप्त होता है, एक अद्भुत स्पर्श का… भीतर जीवात्मा की निकटता के संसर्ग का… और उस निकटता के फलस्वरूप साधक को वह स्थिरता और शांति प्राप्त होती है। 


मस्तिष्क के विज्ञान के वैज्ञानिक अर्थात न्यूरोसाइंटिस्ट का यह मानना है की मस्तिष्क की क्षमता का संपूर्ण उपयोग तब सम्भव होता है जब मस्तिष्क पूर्ण शांति और स्थिरता को प्राप्त होता है। भीतर यह अद्भुत स्थिरता और शांति जब आती है तो मस्तिष्क की संपूर्ण क्षमता पुलकित और जागृत हो कर एक फूल की भांति पुखिल जाती है। मस्तिष्क अपनी क्षमताओं के अधिकांश भाग को हस्तगत कर पाता है।  इसलिए यह शांति - स्थिरता स्थूल मस्तिष्क के लिए और उसकी क्षमताओं के लिए बहुत आवश्यक है। आन्तरिक बोध का क्षेत्र तो इसके द्वारा जागृत होता ही है, पर उसकी मैं यहां चर्चा नहीं करूंगा। Deep intuitive intelligence (स्फुरणा) उसका उल्लेख मैं यहां नहीं कर रहा हूं। यहां केवल बात मस्तिष्क की क्षमता हो रही है। इस मस्तिष्क की क्षमता का सीधा समबन्ध स्थिरता और शान्ति से है। बहुत बड़े अंशों में भीतर की नीरवता से स्थिरता - शांति प्राप्त होती है।

 You are able to access and obtain the latent potential of your brain. जन्म से ही सुप्त क्षमताओं को जागृत विकसित प्राप्त करने का अवसर प्राप्त होता है। इसी का उल्लेख अष्टावक्र गीता में ब्रह्मर्षि अष्टावक्र ने किया था की अजीब सी स्थिरता, अजीब से सुख की अनुभूति, अजीब सी शांति मनुष्य को जीवात्मा की निकटता से प्राप्त होती है। खिड़कियां खुलने लगती है। 


देखो साधक ध्यान अत्यंत सक्रियता का स्त्रोत है, निठल्लेपन, निष्क्रियता और अकर्मण्यता का नहीं है। अत्यधिक स्तरों पर सक्रिय होना है उसके लिए ध्यान है। समझे बाबू। दूसरी बात यह की ध्यान की ऊर्जा तुम्हारे भीतर आरंभ में कुछ व्यतिरेक Aberration लाती है, कई साधकों को ऐसा लगेगा कि कुछ ऐसा उफान भीतर आया है।  अलग-अलग लोगों में अलग-अलग प्रकार के उफान थोड़े समय में आते हैं और समाप्त होते हैं। इसके लिए विशेष चिंता नहीं करनी है।  सिर का भारीपन भी होगा (अगर वह केवल ध्यान से है, अर्थात पूर्व के किसी कारण का वह परिणाम नहीं है ) भारीपन अथवा दर्द अगर नींद की कमी से हैं तो नींद से उसे ठीक करो, अगर तनाव से हैं तो ध्यान से वह ठीक होगा। जिन्हे ध्यान की कक्षाओं में आगे बढ़ना है उन्हें याद रखना चाहिए की जैसे जीवन के लिए ऑक्सीजन जीवित रहने आधार है उसी प्रकार अध्यात्म में निर्बाध रूप से आगे बढ़ने के लिए शवासन आवश्यक है। 


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