ॐ का ध्यान सर से ऊपर

ॐ का ध्यान सर से ऊपर

ॐ का गुञ्जन दिन में एक बार अवश्य होना चाहिए॥ ब्रह्म मुहुर्त्त में कुछ साधक देर से आते हैं ठीक है अपनी सुविधा है सबकी पर ॐ का गुञ्जन मन नहीं भी लगे तो भी अवश्य होना चाहिए॥ गायत्री का जप और ॐ का गुञ्जन मन नहीं भी लगे तो भी होना आवश्यक है॥ मन लगे तो लगाया जाए, इस की तो हम चेष्टाएँ करते हैं, इसके लिए तो हम प्रयासरत रहते ही हैं॥ हम मन को बार-बार बिखराव से बटोरने की चेष्टाएँ करते हैं, भले वे असफल हों पर हम चेष्टाएँ करते हैं॥ इससे ऊपर उठकर मैंने कहा कि मन लगे न लगे ॐ का गुञ्जन और गायत्री का जप अवश्य करना॥ क्योंकि इन दोनों में इनके शब्द की तरंगों में इतना कुछ समाया है जो केवल शब्द की शक्ति का बहुत बड़ा प्रदर्शन हमारे सूक्ष्म जगत में करता है॥ ॐ के द्वारा दिया गया समन्वय alignment, अद्भुत होता है॥ इस पर तो ढेरों सत्संग हो चुके वह अद्भुत होता है, बिखरे हुए मन में भी अद्भुत हो रहा होता है॥ मन ॐ के गुञ्जन में भटकते हुए भी, भटकते हुए भी अपना कार्य करता है और मनुष्य को अनेक स्तरों पर उसमें सामंजस्य alignment बैठाने की चेष्टा करता है, बोध नहीं होता पर वह होता है॥ गायत्री उसी प्रकार है पर यहाँ मैंने ॐ का उल्लेख किया॥

आज का हमारा जो प्रयोग था उसमें ॐ के गुञ्जन को हम केवल अनहत तक ले गए॥ ब्रह्मरन्ध्र, भृकुटि मध्य, कणठकूप और अनहत, उससे नीचे नहीं गए॥ फिर उसके उपरान्त ब्रह्मरन्ध्र और ब्रह्मरन्ध्र से भी बाहर कपाल से ऊपर हमने बाकी का गुञ्जन जो किया वह आकाश में किया॥ भाव रूप में हमारी सजगता आकाश में ही उसे कर रही थी॥ हो गले से रहा था, हाँ ठीक है गले से हो रहा था॥ पर अनुभव कपाल में भी हो रहा था॥ बिलकुल ठीक बात है कपाल में भी अनुभव हो रहा था, पर भाव क्या था? भाव था सिर से ऊपर॥ 'जहाँ चित्त वहाँ प्राण' पातञ्जलि का सूत्र भूलना नहीं है, पातञ्जलि का सूत्र भूलना नहीं है॥ यदि चित्त ॐ के गुञ्जन के समय, ब्रह्म रन्ध्र से ऊपर आकाश में है तो निश्चित रूप से प्राण वहीं है॥ प्राण अर्थात सक्रियता activity, ongoing जो हो रहा है वह वहीं है॥ अर्थात हमने ॐ के गुञ्जन को द्यौ जगत आकाश की ओर लगाने के लिए चित्त लगा दिया॥ प्रसारण में बहुत बड़ी शक्ति आ गई, broadcast में शक्ति आ गई॥ जैसे antenna, height पर लगता है, satellite आकाश में स्थापित होते हैं, उसी प्रकार हमने अपने ॐ के गुञ्जन को एक ऊँचाई दे दी, एक उछाल दे दिया॥ अपने ब्रह्मरन्ध्र से, अपने कपाल से भी ऊपर चित्त को ले जाकर और वहाँ से ॐ को हम छोड़ रहे हैं॥ ॐ वहीं से छोड़ रहे हैं, हर ॐ का गुञ्जन वहीं से बाहर छूट रहा है, तो क्या होता है ? जितने अंशों में समन्वय और सामञ्जस्य साधारण ॐ के गुञ्जन से है उससे उसका प्रभाव कई गुणा बढ़ जाता है multiple times. अत: जब भी कभी हम ॐ का गुञ्जन सामान्यत: करें, चेष्टा यही रहे कि हम ब्रह्मरन्ध्र में कर रहे हैं, दशद्वार में कर रहे हैं कपाल में इस ऊपर के क्षेत्र में कर रहे हैं, ध्यान वहीं रहे॥ कभी-कभी कपाल से ऊपर भी जाना आवश्यक है॥

ॐ का गुञ्जन बाकी स्थानों पर भी कराया, ब्रह्मरन्ध्र, भृकुटि मध्य, कणठकूप और अनहत आदि, वह केवल ऊपर के जितने भी हमारे मर्म स्थल हैं उन्हें हमने हल्का सा स्पन्दित किया॥ पर मूलत: ब्रह्मरन्ध्र और आकाश में हमने ॐ के गुञ्जन को ले जाने की चेष्टा की॥ मैं चाहता हूँ कुछ दिन अब यही अभ्यास कराया जाए आपको, कि ॐ का गुञ्जन हम किस प्रकार चित्त को आकाश में रखकर गुञ्जन करें॥ शरीर को अपना काम करने दो, शरीर तो सीमित है, जहाँ है वहीं रहेगा॥ वह तो यदि आसन पर बैठे हो तो भी वहीं है॥ अत: शरीर में से निकलने वाली ध्वनि गले में ही रहेगी जो गले की सीमा है॥ पर हम चित्त द्वारा उसके गुञ्जन को ब्रह्मरन्ध्र और ब्रह्मरन्ध्र से ऊपर आकाश में ले जाते हैं॥ कौन ले जाता है? चित्त ले जाता है॥ चित्त अपने साथ संकल्प के अनुसार हमारी तीव्र इच्छा के अनुसार उस ॐ की सूक्ष्म ध्वनि को बटोरकर आकाश में छोड़ता है॥ चित्त बटोरता है, कौन? चित्त, चित्त अर्थात awareness हमारी सजगता, चित्त अर्थात the conscious part of our existence हमारे भीतर की चैतन्य क्षमता॥ चैतन्य क्षमता अद्भुत है, पदार्थ उसके सामने नाचता है, भले ही हमें पता न चले पर पदार्थ उसके सामने नाचता है॥

हमारी चेतना ॐ के गुञ्जन को, जो गले से उठ रहा है उसे, चित्त के द्वारा, एक तीव्र इच्छा के द्वारा आकाश में ले जाकर छोड़ देगी॥ न केवल हमारे भीतर बहुत बड़ा सामञ्जस्य होना आरम्भ होता है अपितु पूरे द्यौ जगत में जब ॐ का प्रसारण हम करते हैं अनेकों प्रकार के जो हमारे ब्रह्ममुहुर्त्त के सहायक, विशेषकर जो जागृत वातावरण में तपे हुए वातावरण में जो सूक्ष्म सत्ताएँ हैं उनका आकर्षण होता है और उनके आकर्षण से साधक को आत्म उत्कर्ष हेतु अनेक अंशों में सहायता प्राप्त होती है॥

अत: कुछ दिन हम यह प्रयोग करते हैं॥ हम अपनी सजगता को अपने चित्त की क्षमता के द्वारा, अपनी तीव्र अभिलाषा के द्वारा हम आकाश में ले जाएँगे॥ पहले हम सामान्य ॐ से ही आरम्भ करेंगे॥ सामान्य ॐ ब्रह्मरन्ध्र से, फिर हम भृकुटि मध्य थोड़ी देर, फिर कण्ठ के मध्य थोड़ी देर, फिर छाती के मध्य थोड़ी देर, स्पन्दन करेंगे॥ जैसे एक प्रकार से मालिश करना, massage करना इन तीनों को हल्की-हल्की massage देंगे॥ उसके बाद फिर हम वापिस यहाँ से आकाश में चले जाएँगे और आकाश में कुछ देर रहेंगे चित्त के साथ॥ किसके साथ? चित्त के साथ॥ ॐ का गुञ्जन आकाश में, हम कहाँ हैं? आकाश में, हम कहाँ हैं? आकाश में॥ हम कहाँ हैं? कपाल से ऊपर॥ हम कहाँ हैं? ब्रह्मरन्ध्र से ऊपर॥ ब्रह्मरन्ध्र से ऊपर हैं हम; यह भाव करते हुए हम वहीं से ॐ को ऊपर आकाश में छोड़ रहे हैं॥

यह सारा जागृत वातावरण ब्रह्म मुहुर्त्त, जागृत महान ऋषि सत्ताएँ इस प्रकार के प्रसारण से आकर्षित होती हैं॥ न भूलो एक विशेष विधि और एक विशेष प्रकार की साधना से महात्मा तैलंग स्वामी जी ब्रह्म ऋषि महाराज ने एक साधक को (जिन पर हमने एक कार्यक्रम भी किया था), उन्हें हिमालय कैलाश में बैठे हुए सूक्ष्म शरीरधारी, कैलाश के पास किसी पास किसी गुफा में उनके गुरू को आकर्षित करने के लिए कहा था, कि इसके द्वारा तुम्हारा गुरू आकर्षित होगा॥ आप लोग भूल चुके होंगे, यह किसी sand satsang के कार्यक्रम में आया था॥ उसी प्रकार हम भी महान सत्ताओं को इस प्रकार के ध्यान से आकर्षित करते हैं॥ गायत्री भी यही कार्य करती है, वह अपने प्रकार से करती है, ॐ का गुञ्जन अपने प्रकार से करता है॥ अत: कुछ दिन इसका अभ्यास अब हम आगे चलाएँगे॥

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