अहंकार की सात्विक महाशक्ति Part - 4

अहंकार की सात्विक महाशक्ति Part - 4

अहंकार की सात्विक महाशक्ति - भाग 4

हनुमान जी के विषय में हम सुनते आए हैं कि उन्हें उनकी असीम शक्तियों के विषय में स्मरण कराना पड़ता था॥ शक्तियाँ उनमें हैं निस्सन्देह, फिर भी उनकी शक्तियों का उन्हें बोध, स्मरण कराना पड़ता था॥ अर्थात जो वे हैं उसी का परिचय उनको कराया जाता था, जिसके द्वारा उनकी वे अद्भुत असीम अद्वितीय क्षमताएँ जागृत हो उठती थी॥ जब कोई बड़ा कार्य कराना हो, बड़े उद्देश्य की पूर्त्ति करानी होती तो उन्हें उनकी क्षमताओं का परिचय दिया जाता था कि तुम वस्तुत: वह नहीं जैसा तुम आचरण कर रहे हो, अपितु हे कपि! तुम तो बहुत पराक्रमी हो, बलशाली हो, तुममें तो इतनी क्षमताएँ हैं कि उसका कोई सानी नहीं है॥ तो जैसे-जैसे उन्हें स्मरण कराया जाता था उनकी क्षमताएँ जागृत हो उठती थी और वे बड़े उद्देश्यों की पूर्त्ति के लिए खड़े हो जाते थे, चल निकलते थे॥

उस हनुमन्त अवस्था का यह भाव प्रत्येक जीव में है॥ एक पहचान वह, जो जीव ओढ़ लेता है एक बाहरी असुरक्षा का सामना करने के लिए, जिसे हम प्रतीति कहते हैं Pretentious, अपने आपको दिखाने की चेष्टा, लादने की चेष्टा, अकारण ही दूसरों पर अपना आधिपत्य दिखाने की, स्थापित करने की चेष्टा, जबकि कि वह इस प्रकार का है नहीं॥ उसके भीतर का अद्भुत शिव संकल्प, शौर्य, साहस, पराक्रम धैर्य; ये उसका मूल अस्तित्व हैं जिसका उसे बोध नहीं है॥ यह किसकी बात हो रही है? प्रत्येक जीव की मुझ से लेकर प्रत्येक जीव तक॥

हमें वास्तविक स्वरूप का बोध नहीं है और उसका कारण भी सत्य है॥ अपनी पहचान को हमने दर्पण में देखा, दूसरों की आँखों में देखा॥ हमने अपने आपको अन्तर्मुखी होकर के देखने की चेष्टा भी कब की है? नहीं कर पाते॥ यह सत्य है कि जैसे-जैसे साधक ध्यान में गहरे उतरता जाता है, उसे बोध भी नहीं होता कि उसके बहुत सारे आवरण जो ओढ़े हुए हैं जो उसका वास्तविक अस्तित्व नहीं है ओढ़ी पहचान है; वह छँटने लगती है॥ हाँ एकाएक कुछ नहीं होगा, आप कहो कि आज साधना आरम्भ की और 2 महीने में मैं अपने मूल अस्तित्व को प्राप्त हो गया / हो गयी; न ऐसा नहीं है॥ हाँ, यदि पूर्व के जन्मों की आध्यात्मिक यात्रा पहले से है तो फिर कम समय लगता है अन्यथा समय अधिक लगता है॥ अपनी ओढ़ी हुई पहचान को त्यागने में समय लगता है॥

मनुष्य के भीतर का जो उसका अस्तित्व है वह पहले से ही बहुत शक्ति सम्पन्न है वहाँ किसी भय आशंका का कोई स्थान नहीं है, वहाँ किसी अक्षमता का कोई स्थान नहीं है॥ अपने आपको किसी पर लादने की वहाँ आवश्यकता ही नहीं है, अपने आपको किसी अन्य पर आरोपित करने की आवश्यकता नहीं है॥ वह नित्य शुद्ध, नित्य मुक्त, नित्य बुद्ध है; पर होते हुए भी आभास नहीं है॥ क्योंकि जन्मों से आई हुई ओढ़ी हुई पहचान और साथ-साथ असुरक्षा insecurity, वह मनुष्य को एक ऐसी प्रतीति में डाल देती है कि वह, अपने आपको वह दिखाता है जो वह मूलत: नहीं है॥

अहंकार की सात्विक महाशक्ति, शब्द ध्यान रहे 'महाशक्ति' और 'सात्विक महाशक्ति', यह उसी बोध में है जो हनुमान को कराया जाता है, बड़े उद्देश्य की पूर्त्ति हेतु कराया जाता है॥ चाहे उद्देश्य लौकिक जगत का भी क्यों न हो पर जब तक क्षमताओं का परिचय नहीं दिया जाएगा मनुष्य कुछ भी करने में अक्षम रहेगा॥ ये बातें तो ओढ़ी हुई पहचान की हैं ओढ़ी हुई पहचान की॥ परन्तु यहाँ तो बात सात्विक अहंकार की है, 'सात्विक अहंकार' जिसमें कुछ नहीं मिलाया आपने॥ वह अपने आप में नित्य शुद्ध है क्योंकि आत्मा का प्रकाश सर्व प्रथम अहंकार के स्वरूप में ही अवतरित होकर जीवात्मा का निर्माण करता है॥ आत्मा और जीवात्मा भिन्न हैं, पूर्व में भी कहा॥ आत्मा जिस पर कोई आवरण नहीं है, जीवात्मा जिस पर आवरण है जो अभी पंचकोषों के अधीन है जिसमें अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय सब हैं॥ अभी जीवात्मा कोषों के अधीन है, आत्मा की बात नहीं॥ जीवात्मा के स्तर पर भी जैसे-जैसे हम अपने मन, बुद्धि, और चित्त से पीछे हटते जाते हैं; 'मन, बुद्धि और चित्त' से पीछे हटते जाते हैं हम अपने सात्विक अहंकार की ओर आगे बढ़ते जाते हैं॥

तुम यूँ जान लो कि कहीं सूर्य का प्रकाश किसी शीशे पर गिरे दर्पण पर गिरे, और दर्पण से प्रकाश फिर कहीं अन्यत्र चला जाए और वहाँ भी दर्पण लगा हो तो वहाँ से फिर तीसरे और फिर चौथे पर जाएगा॥ अर्थात दर्पण उस प्रकाश को परावर्तित करेंगे॥ प्रकाश सूर्य का है, आत्मा सूर्य है॥ आत्मा का प्रकाश जिस प्रथम दर्पण पर पड़ता है उसे 'अहंकार' कहा गया॥ आत्मा का प्रकाश जिस प्रथम दर्पण पर पड़ा है उसे 'अहंकार' कहा गया॥ अहंकार से होकर के वह फिर आगे दूसरे दर्पण पर जाता है जिसे हम 'चित्त, बुद्धि, मन' के नाम से जानते हैं॥ प्रकाश किसका है? आत्मा का, आया किसके माध्यम से? अहंकार के माध्यम से॥ यह उसी प्रकार है जैसे सूर्य का प्रकाश चन्द्र पर और चन्द्रमा की चाँदनी पूर्णिमा की रात्रि में पृथ्वी पर पड़ती है॥ प्रकाश किसका? सूर्य का, आया किससे? चन्द्रमा से॥ प्रकाश किसका? आत्मा का, आया किससे? अहंकार के माध्यम से वह हम तक पहुँचा, हम अर्थात हमारे बाकी के पूरे अस्तित्व 'चित्त, बुद्धि, मन' ईत्यादि॥ ये किसके प्रकाश से प्रकाशित हैं? मूल तो आत्मा है पर आत्मा निर्लिप्त है॥ 'अहंकार' रूपी दर्पण पर पड़ने के उपरान्त वह प्रकाश नए स्वरूपों को प्राप्त करता है॥

यह तो सत्य है कि आत्म साक्षात्कार तो 'कभी' होने वाला कोई एक उपलब्धि है॥ कभी जब होगी तब होगी पर यदि सात्विक अहंकार तक भी हम पहुँच जाते हैं, शुद्ध अहंकार जिसमें कुछ ओढ़ा हुआ नहीं है, जैसा सूर्य से आकर पड़ रहा है बिलकुल वैसे ही, वहाँ तक पहुँच जाते हैं तो एक अद्भुत बल आता है, अद्भुत बल आता है॥ ओढ़ी हुई पहचान छिटक जाती है, ओढ़ी पहचान जो विचारों की है धारणाओं की है कल्पनाओं की है स्मृतियों की है अर्थात जो 'मन, बुद्धि, चित्त' के संकलन हैं संचय हैं वे छिटक जाते हैं॥

यही सारा विज्ञान, यही सारी साधना विज्ञानमय कोष की है॥ विज्ञानमय कोष की साधना में साधक के ओढ़े हुए मन, कामनाएँ, बुद्धि, विचार, 'तर्क, वितर्क, कुतर्क', चित्त, स्मृतियाँ, कल्पनाएँ ईत्यादि ईत्यादि सब छिटक कर के पीछे आते हैं, किस पर? वह पहला दर्पण जिस पर प्रकाश पड़ रहा है सीधा आत्मा का॥ वह पहला दर्पण कौन? अहंकार!

उस पर आते हैं उस 'अहं के आकार' पर आते हैं जहाँ बचता है क्या? मैं, मैं, मैं, ...
कौन हूँ मैं?
यह प्रश्न कौन करता है? कौन करता है?
कौन हूँ मैं? यह प्रश्न, मन नहीं कर रहा, बुद्धि नहीं कर रही, चित्त नहीं कर रहा, यह प्रश्न आत्मा भी नहीं कर रही है उसे तो कुछ जानने की आवश्यकता भी नहीं है॥ यह प्रश्न वह प्रथम, प्राथमिक आवरण the primary reflector जिसे 'अहंकार' कहा, यह प्रश्न वह पूछ रहा है॥ यह जिसे मैं अपना अस्तित्व मान कर बैठा हूँ, जिस रूप को जिस नाम को जिस पहचान को मैंने अपना आपा मान लिया, वे सब तो ओढ़े हुए हैं, न रहने वाले हैं, बदलते हैं वे तो॥ हर चीज परिवर्तनशील है, वह शरीर हो, विचार हो, धारणाएँ हों, कल्पनाएँ हों, कामनाएँ हों, कुछ भी हो, सब बदलती हैं॥ तो फिर यह जो अनुभव करता है वह 'मैं' कौन हूँ मैं? Who Am I?
'Who am I' का प्रश्न कौन पूछ रहा है? अहंकार!

वह अन्तिम दहलीज जिसे लाँघने में जन्मों लग जाते हैं पर वह जैसे ही लाँघी गई, सब छिटक जाता है; जीव मूल आत्मा में प्रवेश करता है॥ इतना तो मैं बिना आत्मसाक्षात्कार के भी जानता हूँ और कह सकता हूँ॥ उस 'who am I मैं कौन हूँ' पर खड़ा हुआ दहलीज पर खड़ा हुआ साधक, अपने विशुद्ध सात्विक अहंकार में खड़ा है॥ वह ego वाला अहंकार नहीं जो दूसरों पर अपने आपको थोपने की चेष्टा करता है वह नहीं, विशुद्ध अहंकार सात्विक अहंकार मैं, क्योंकि मैं बची है अभी; जब तक मैं बची है यह अहंकार बचा है॥ यह 'मैं' का ही अनधिकृत विस्तार illegitimate inflation उसे हम दूसरा अहंकार प्रचलन में ego वाला अहंकार भी कहते हैं, पर यह सात्विक है विशुद्ध है कि मैं आखिर क्या हूँ॥ बाकी सब बदल रहा है परिवर्तनशील है॥ न मैं बुद्धि, न मन, न विचार, न कामना, न स्मृति, न कल्पना तो फिर मैं आखिर हूँ कया? मैं, यह वह सात्विक अहंकार है जहाँ फिर अद्भुत क्षमताएँ भीतर जागृत होती हैं॥ ओढ़े स्वरूप रहते हैं जाते नहीं हैं, पर उनकी पकड़ बहुत क्षीण हो जाती है इस 'मैं, सात्विक मैं' पर आरूढ़ साधक की ओढ़ी हुई पहचान भले ही बनी रहे पर वह उसी प्रकार है जैसे दशहरे का रावण॥ केवल कागज का पुतला खड़ा किया जाता है उतना भर रह जाता है, चिंगारी लगते भक करके गिर जाएगा॥ उसी प्रकार 'मैं' की उस विशुद्ध अवस्था में पहुँचा हुआ साधक उसी प्रकार है कि ढाँचा पूरा दिखाई देरहा है, सब कुछ दिखाई दे रहा है, तलवार तीर कमान सब है, पर जिस दिन वह जरा सी चिंगारी लगेगी यह मैं ही समाप्त हो जाएगा॥ 'मैं कौन हूँ? who am I?

चिंगारी लगी नही भक कर के गिर जाएगा और फिर हो जाएगा आत्म साक्षात्कार, मेरा भले ही नहीं हुआ पर मैं इतना तो जानता हूँ॥ हाँ, उसमें समय बहुत लगता है, उस होने वाले अन्तिम क्षण के भक में जन्मों उसी में लग जाते हैं॥ ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बहुत सारे कर्म बन्धन भी ओढ़ी हुई पहचान को नहीं जाने देते॥ ओढ़ी पहचान चिपक कर के, रोक कर के बैठी रहती है और यदि जीव उस विशुद्ध सात्विक अहंकार में आकर के कोई संकल्प ले ले तो उसे विधाता भी बदल नहीं सकता॥

शिव संकल्प कौन लेगा? 'मैं' ही तो लेगा हर किसी का मैं॥ संकल्प यदि शिव भी है तो कौन लेगा? 'मैं'॥ इसीलिए कहते हैं 'इच्छाएँ किसी की पूरी नहीं होती, संकल्प किसी के अधूरे नहीं रहते'॥ 'इच्छा से संकल्प फिर चमत्कार' पुस्तक में मैंने यही तो लिखा है शीर्षक पंक्ति में:
इच्छाएँ किसी की पूरी नहीं होती, संकल्प (वास्तविक शब्द होना चाहिए शिव संकल्प) किसी के अधूरे नहीं रहते॥ शिव संकल्प अर्थात आत्मा के विशुद्ध प्रकाश की पूर्ण साक्षी में लिया गया संकल्प॥ वह शिवसंकल्प, उसे फिर कोई हटा नहीं सकता॥ जब वह शिव संकल्प है तो फिर वह विधाता का संकल्प है, वह हजार प्रतिकूलताओं में भी पूर्ण होकर रहेगा॥ फिर एक जन्म या दो जन्म या दस जन्म ये जन्म फिर उसके लिए कुछ नहीं केवल यात्रा के पडाव हैं॥ एक स्थान से दूसरे स्थान जाते समय बीच में बहुत स्टेशन आते हैं, ये जन्म फिर पड़ाव हैं॥ जिस जीवात्मा का एक शिव संकल्प जागृत हो गया, फिर एक जन्म या कई जन्म, वे स्टेशन हैं पड़ाव हैं, वह शिव संकल्प पूरा होकर रहेगा॥ क्यों ? क्योंकि वह 'शिव संकल्प' है, वह विशुद्ध अहंकार की अवस्था में, 'अहंकार' अब तो तुम समझने लगे कि 'सात्विक अहंकार' क्या है, उसमें लिया गया संकल्प है॥ इसीलिए सात्विक संकल्प, शिव संकल्प की महाशक्ति कितनी प्रचण्ड हो सकती है इसका परिचय अभी आने वाली और श्रृंखलाओं में होता रहेगा॥

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