आदि शंकराचार्य जी के शब्द “आत्म विषय बुद्धि”

आदि शंकराचार्य जी के शब्द “आत्म विषय बुद्धि”

आज का विषय है  “आत्म विषय बुद्धि”, आदि गुरु शंकराचार्य जी ने इस शब्द को हमारी आने वाली अनेक सन्ततियों को इस विशेष शब्द का मर्म समझाते हुए श्रीमद्भगवद्गीता के संदर्भ में बताया है। भगवद गीता में ‘पंडित’ शब्द आता है ‘पंडित’ शब्द का मर्म समझना बड़ा आवश्यक है।  “पंड” शब्द से बना पंडित, पंड का अर्थ है वह भाव/तत्व जिसमें शुद्ध प्रकाश हो। विशुद्ध प्रकाश जिसमे कुछ मिलावट नहीं (pure radiance, luminosity) . आदि गुरु शंकराचार्य जी ने कहा जिसके पास “आत्म विषय बुद्धि” है वह पंडित है।  जिसके पास “आत्म विषय बुद्धि” हो अर्थात आत्मा जिसका मूल विषय है। 


आत्मा जिसका मुख्य विषय है उसके लिए पंडित शब्द प्रयोग किया जा सकता है जो अपने मन की प्राथमिकता में, अपनी सोच में, अपने विचारों में, अपने चिंतन में सदा सर्वदा आत्मा को, चेतना को उस नित्य अजन्मे के सत्य को प्राथमिकता देगा, उसी पर आधारित एवं आश्रित होगा। जिस किसी की वह बुद्धि होगी उसे कहा जाएगा पंडित। 


पंडित शब्द से पूरित होने के लिए आवश्यक है कि स्वयं को टटोल कर जानने की चेष्टा करें की मेरे चिंतन मनन में कितने अंशों में आत्म विषय बुद्धि है। अगर 1% भी नहीं तो आप इस लेख को पढ़ भी नहीं रहे होते। कोई आपके हाथ पैर बांधकर आपको ऐसा लेख नहीं पढ़ा सकता है।  आवश्यक है आत्म विश्लेषण के द्वारा यह स्वयं जानना की आत्म विषय बुद्धि कितने अंशों में मेरे पास है। जो यह जानने की चेष्टा करेगा और जिस जिसके पास आत्म विषय बुद्धि है कितने भी में हो फर्क नहीं पड़ता।  आवश्यक नहीं कि जीवन में सभी चिंतन मनन के विषयों का 90% आत्मा ही विषय हो। एक दिन भर में आत्मा एक विषय होना आवश्यक है जो 24 घंटे में दिए गए उसमें से 10% कम से कम होना चाहिए।  यह कहने को तो किसी ग्रंथ में नहीं कहा गया। कहने को तो कहते हैं अरे कम से कम दिन का छठा भाग तो आत्म विषय को देना चाहिए। यह कहीं लिखा नहीं है। जिसे थोड़ी आत्मिक प्रगति करनी हो उसे कम से कम 10% समय अर्थात 1 जीवन दिन का 10 प्रतिशत इस विषय को अवश्य देना ही चाहिए। यही इस जीवन का मूल उद्देश्य भी है।  


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