मैं कहता हूँ ध्यान में नींद आए तो मुक्त हो कर सो जाओ

मैं कहता हूँ ध्यान में नींद आए तो मुक्त हो कर सो जाओ

 

साधक एक भ्रम दूर करना आवश्यक है।   शास्त्र कहता है की तमोगुण से प्रभावित व्यक्ति प्रमाद, आलस्य और निद्रा के वशीभूत होता है।  पुनः जानो की तमोगुण में ग्रसा हुआ जीव प्रमाद, आलस्य और निद्रा में पूरी तरह जकड़ा हुआ होता है अर्थात इन तीनों में फंसा होता है. पर इस  अकाट्य सत्य के साथ एक भ्रम भी है, जिसे स्पष्ट करना बड़ा आवश्यक और नितांत आवश्यक है। आलस्य कुछ अंशों में रजोगुण के प्रभाव से भी हो सकता है और जैसा  के लेख में बताया गया की आलस्य की समस्या को निश्चित रूप से साधक अपने स्वयं साथ अनुशासन की कड़ाई करके, अर्थात अनुशासित स्वरूप में अपने आप से बात करके (स्वयं से संवाद)  और कोई संकल्प उठा कर अपने आलस्य को अपने अभ्यास के द्वारा ठीक किया जा सकता है।  प्रमाद को हटाने के लिए तो तप चाहिए, एक संघर्ष चाहिए। 


देखो साधक कहीं शास्त्र के उल्लेख से अपने भीतर यह भ्रम दूर होना आवश्यक है कि निद्रा - निद्रा केवल तमोगुणी प्रमादी  को ही मात्र प्रभावित नहीं करते अपितु रजोगुण भी निद्रा के वशीभूत बहुत अंशों में तब हो जाते हैं।  दोहराना चाहूंगा जिससे आपको अच्छी तरह समझ आ जाए। रजोगुणी भी अर्थात वह जीव जो बहरी गतिविधियों में बहुत सक्रिय बने रहते हैं, जिनका दिमाग सारा दिन चलता ही रहता है, जिनका मस्तिष्क रुकता ही नहीं है।  ऐसे रजोगुण आपाधापी में लगे रहते हैं तो कभी वह कभी उठापटक में लिप्त रहते हैं।  ऐसेरजोगुणी जब कभी भी सतोगुण के प्रभाव से किसी आध्यात्मिक प्रक्रिया में से होकर के निकलते हैं तो तत्क्षण - तत्काल उन पर निद्रा अपना प्रभाव  दिखाती है। इसीलिए अध्यात्म पथ पर आने वाले अनेक साधकों की शिकायत यह रहती है की ध्यान में नींद बहुत आती है, बीच  - बीच में झपकी आ जाती है, पता नहीं क्या करें हमें तो बहुत नींद आती है। ध्यान नहीं लग पाता है।  आगे पीछे तो नहीं बस ध्यान के समय पर ही हमे बहुत नींद आती है। जरा सा ध्यान में बैठो की उबासी आनी शुरू हो जाएगी। ध्यान का समय पूरा करने के लिए अपने आप को जगाए रखने  हेतु अपने आप  पड़ता है।  कई बार तो यह सोचते हुए अपने अंदर बुरा भी बुरा लगता है, पर क्या करें नींद ही बहुत आती है। साधक ऐसे में यह जो ऊपर कहा गया जिन्हें भी अनुभव होता है वह यह न समझ ले की शास्त्र ने  ठीक ही तो कहा है की; जिस व्यक्ति को निद्रा बहुधा अत्यधिक प्रभावित करती है वह केवल तामसिक ही होगा।   रजोगुणी व्यक्ति पर भी निद्रा का आक्रमण तब तत्क्षण होता है जब वह तनिक सा भी भीतर निष्क्रिय होता है। उसका मस्तिष्क किसी विश्रांति-विश्राम करने की चेष्टा करता है, हल्की सी रिलैक्सेशन और लो आ गया निद्रा का झोंका। 


इसीलिए ध्यान की कक्षाओं में केवल यही नहीं आरंभ में तो 1 साल पूर्व जब हमने ब्रह्म मुहूर्त का ध्यान ऑनलाइन आरंभ किया था, तो मैं अक्सर कहता  था, यहां तक की ऋषिकेश में भी जब अनुभूति प्रवास जैसे कार्यक्रम होते हैं और बहुत लोग सामने बैठे होते है तब भी मैं स्वयं यह अनुमति प्रदान करता हूँ की ध्यान हो अथवा कक्षा अगर निद्रा आ रही है तो बिना किसी ग्लानि के मेरी आज्ञा से स्वछन्द होकर यहीं सो जाओ। वर्षो से मस्तिष्क को तुमने त्रस्त कर रखा है अतः अगर उसे विश्राम का अवसर प्राप्त हो रहा है तो सो जाओ। मेरे पास आने का कम से कम इतना लाभ तो तुम्हें प्राप्त हो की जो गहरी निद्रा तुम्हें अपने आरामदायक बिस्तर पर नहीं प्राप्त होती वह यहीं धरती पर मात्र एक दरी पर ही प्राप्त हो रही है।  वापस लौटोगे तो पूर्ण विश्राम से तरो तजा होकर ही लौटोगे। 


 देखो साधक अब ध्यान से जान लो की तुम्हारा वास्तविक अस्तित्व क्या जो पहने हुए  कपड़े हैं  क्या वही है। नहीं बाबूजी के यह नहीं है। क्या है तुम्हारा वास्तविक स्वरूप? तुम्हारी सजगता है तुम्हारा वास्तविक स्वरुप, वास्तिवक अस्तित्व। बाबू अगर तुम्हारी सजगता ही अधूरी बनी रही।  तुम आधे सोए आधे  जागते और थके - थके बने रहे। तो  क्या जीवन यही है जी ? कोई जीवन नहीं है बाबू इसलिए पहले सजगता को बटोरो।  यह ध्यान तुम्हें अवसर देता है की तुम अपने मूल अस्तित्व को बटोर कर भीतर समन्वय और  सामंजस्य (allignment)  स्थात्पित करो। इसलिए अगर तुम्हें ध्यान में  नींद आ रही है तो वह अभी तमोगुण नहीं है। तमोगुण से ग्रसा व्यक्ति तो सूर्योदय से पूर्व ध्यान हेतु पहुँच ही नहीं पाएगा। 


ध्यान मनुष्य के अस्तित्व का विकास है जिससे उसका अस्तित्व व प्रखर हो सजग हो एकजुट हो। यह विकास बाबू विश्राम प्राप्त स्थिर मानस को ही प्राप्त  पाएगा, इसलिए कभी ध्यान में निद्रा आए तो निःसंकोच उसे प्राप्त करो। ध्यान  के उपरांत निद्रा आए तो निःसंकोच सो जाओ। तुम सम्भवतः कहोगे की हम तो सुनते आएं है की ब्रह्म मुहूर्त में हमने सोना नहीं चाहिए। आपने बिलकुल ठीक सुना है, पर आपने जो सुना है वह उनके लिए है जो रात भर से सोते रहे। यह सूत्र आपके लिए नहीं है,आप तो ब्रह्म मुहूर्त पूर्व जग चुके हैं। 3:00 बजे 3:15 अथवा  4:30 बजे जो  भी आपका जगने का समय रहा हो, आप तो जाग ही चुके हैं। आपने तो उठ कर चेष्टा करनी आरंभ कर दी आपकी आरंभिक चेष्टा में अगर नींद आ गई यां ध्यान के बाद नींद आ गई तो बड़े शौक से सो जाओ। Magic Moments पुस्तक में यही तो Sleep Engineering के लिए कहा गया है। ध्यान के उपरांत आने वाली इस निद्रा की तुलना रात्रि की पूरी निद्रा से करके देखो तो पता चलेगा।  इतनी अद्भुत नींद आएगी की कहना ही क्या। इसलिए ध्यान में जब भी नींद आए विश्राम करने का मन करे तो सो जाओ और बीच में जब नींद खुले फिर वहीँ से ध्यान चल रहा हो उसमें जुड़ जाओ। बात समझ में आई कि नहीं, इसलिए कभी ग्लानि भाव केवल  इसलिए की शास्त्र कहता है कि तामसिक को प्रमाद आलस्य निद्रा बांधते हैं।  हाँ यह सत्य है पर सत्य यह भी तो है कि केवल तामसिक को ही नहीं अत्याधिक उथल-पुथल वाले मस्तिष्क को भी जब ध्यान रूपी विश्राम प्राप्त  होता है तो वह अपना सबसे पहला कार्यक्रम आरंभ कर डालता है।  


औरों की मैं नहीं कहूंगा सबका अपना अनुशासन हो सकता है पर इस अध्यापक के साथ अगर आप को ध्यान में नींद आए कक्षा में भी नींद आए तो आराम से सो जाओ कोई ग्लानि (Guilt) नहीं, कोई खेद नहीं कोई, चिंता नहीं, कोई दोष नहीं आराम से पूरे आत्मविश्वास - आत्मसम्मान के साथ सो जाओ।  ध्यान जैसे जैसे अपना प्रभाव दिखता जाता है वैसे - वैसे ध्यान के बीच में निद्रा आना समाप्त हो जाती है। 


3 - 5 महीने अगर ऐसा चलता भी रहे तो क्या हानि है। 30 साल निकाल दिए तथाकथित झूठ मूठ का जागते - जागते।  यह नींद बड़ी गहरी होगी। इस नींद में तुम बिना किसी स्वप्न के इसके माध्यम से संभव है की सुषुप्ति की अवस्था में चले जाओ। तो क्या यह कोई छोटी बात समझते हो, बड़ी बात है। इसीलिए मैं अपनी कक्षाओं में पढ़ाते हुए भी कह देता हूँ, की तुम चिंता मत करो अगर दो अक्षर कम भी पढ़ोगे तो कोई अंतर नहीं आएगा।  पहले ज्ञान को आत्मसात करने के लिए जागृत बुद्धि तो तैयार करो. बुद्धि ही अगर सोई रहेगी बुद्धि ही अगर अधूरी क्षमता लिए मेरे सामने होगी तो वह जीव क्या समझेगा और  क्या धारण करेगा।  और क्या ही तुम उस अधूरे ज्ञान से अपने जीवन में उसके अनुरूप परिवर्तन ला पाओगे।  कुछ नहीं। इसलिए सर्वपर्थम  हैं अपनी सजगता को बटोरो।  तुम्हारा वास्तविक अस्तित्व है तुतुम्हारी सजगता। 


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