Part - 25. पांच स्तरीय आत्म उत्कर्ष प्रशिक्षण के आधार - व्यवस्थित चिन्तन विचारों की शक्ति का आधार

Part - 25. पांच स्तरीय आत्म उत्कर्ष प्रशिक्षण के आधार - व्यवस्थित चिन्तन विचारों की शक्ति का आधार

व्यवस्थित चिंतन विचारों की शक्ति का आधार है

यह कितने बड़े स्तर पर मनुष्य के अन्तर्जगत में परिवर्तन ला सकता है धीरे-धीरे साधकों को इसका अनुमान होना आरम्भ होगा ॥ विशेष रूप से तब, जब यह प्रशिक्षण पूर्ण होने पर आप इसका पुनरावलोकन Revision करेंगे तो बहुत सी कड़ियाँ आपस में गुँथ जाएँगी॥ प्राचीन भारतीय मनीषा का आत्म निर्माण का एक बहुत सुन्दर क्रम है जिसके अन्तर्गत वर्तमान में यह प्रशिक्षण चल रहा है॥ पाठ्यक्रम तो अलग है जो साथ-साथ विषयों में चल रहा है, पर उस पाठ्यक्रम के पीछे एक strategy एक क्रम, एक नीति है जो मनुष्य के आत्म निर्माण के लिए श्रेष्ठतम है तथा जिसके पाँच चरण हैं॥ इसका पूर्व में भी सत्संग में उल्लेख किया जा चुका है, पर आज उसका प्रसंग सर्वाधिक है क्योंकि आज हम उसके अन्तर्गत होकर चल रहे हैं॥ यह सब कुछ यूँ ही नहीं हो रहा है यह प्रशिक्षण बहुत गहन विचार के अन्तर्गत है॥

वे पाँच चरण क्या हैं, यह समझ में आना आवश्यक है:
1) पहला आत्म अवलोकन
2) दूसरा आत्मदर्शन
3) तीसरा आत्म परिष्कार
4) चौथा आत्म विकास
5) पाँचवा आत्म निर्माण
इस पूरे प्रशिक्षण के ये पाँच इसके क्रम हैं॥

आत्म अवलोकन - आत्म अवलोकन में आप पहली बार अपने भीतर अन्तर्मुखी होते हो॥ यह 'अन्तर्मुखी होना' ध्यान के लिए नहीं बल्कि इस प्रशिक्षण के लिए, आत्मनिर्माण के लिए है अन्तर्मुखी होना है॥ उसे अन्तर्मुखी कहा जिसके लिए आपने सबसे पहले 'धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवा:' - यह श्लोक पढ़ा और आप अन्तर्मुखी हुए॥ मेरे भीतर के 'धर्मक्षेत्र और कुरुक्षेत्र' में क्या चल रहा है, इसे जानने के लिए आप अन्तर्मुखी हुए॥ यह आत्म अवलोकन की प्रक्रिया है जिसमें आपने अपने ध्यान को 'अपनी ओर' किया और 'अपने आप को' अनुभव किया कि मेरा जीवनदिन मेरी गतिविधियाँ मेरी साँसें किस प्रकार क्या सम्पन्न कर रही हैं॥ अन्तर्मुखी होकर आपने अपने आपको जाना, जो कुछ भी आप जान पाए, जितनी गम्भीरता से आत्म अवलोकन उतना ही आप जान पाए॥

आत्मदर्शन - आत्म अवलोकन के उपरान्त दूसरा है आत्मदर्शन - पहले अन्तर्मुखी होकर जानने की चेष्टा की कि मेरे भीतर क्या कुछ चल रहा है॥ फिर जो कुछ भी चल रहा है आखिर यह क्यों चल रहा है॥ मान लीजिए मेरे भीतर कुछ मेरे स्वभाव में, मेरे आचरण में, मेरी प्रतिक्रिया में, मेरी निर्णय लेने की क्षमता में यदि कोई बहुत बड़ी चूक हो रही है तो उसका स्रोत क्या है? After all why? कौन सा ऐसा दुर्योधन है जो भीतर बैठा हुआ है? जब आप अपने आप में और गहरे भीतर कुछ पहचानने के लिए उतरे उसे कहा गया 'आत्मदर्शन'॥ अर्थात अब आपने, अपने आपको और अधिक गहराई से अनुभव करना आरम्भ कर दिया॥ 'दर्शन' शब्द बहुत गहरा है और आपने दुर्योधन को पहचानने की सारी प्रक्रिया पूर्ण करनी आरम्भ कर दी॥ जैसे ही आपका 'आत्मदर्शन', दुर्योधन की पहचान करना पूरा हुआ, जितना भी हुआ जितनी आपकी गम्भीरता थी, तो अब आपको इसे हटाना था, यहाँ तीसरा चरण आ गया आत्म परिष्कार॥

आत्म परिष्कार - दुर्योधन पहचान लिया गया जो भीतर अराजकता फैलाता है, इसकी सफाई होनी आवश्यक है, अब उसको हटाना है यह परिष्कार है॥ जैसे ही 'आत्म परिष्कार' का चरण आया अब उसके लिए ऊर्जा चाहिए, energy चाहिए, resource चाहिए, भीतर का resource, जिससे मैं भीतर के दुर्योधन को परास्त कर सकूँ॥ तो आत्म परिष्कार में आ गया तप, तप, तप... आप तप पर आरूढ़ हो गए और तप एवं संयम के अन्तर्गत आपने पूरी श्रृंखला में जाना कि तप की रक्षा किस भाव से करनी है॥

'निराशी', 'निर्मम', 'विगतज्वरा' ये सब तप के विषय में हैं और इनके बिना तप सफल होने वाला नहीं है॥ आपकी सज्जनता धेले की नहीं यदि आपमें सबलता नहीं है कुछ करने की क्षमता नहीं है और आप पर असुरता हावी है, भीतर अथवा बाहर, तो आपकी सज्जनता धेले की नहीं बल्कि वह अधिक घातक है॥ अब आपने आत्म परिष्कार के अन्तर्गत तीसरे क्रम में भीतर की खरपतवार शत्रुओं को निर्मूल परास्त करने के लिए ऊर्जा संचय आरम्भ कर दिया॥ जैसे-जैसे ऊर्जा बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे आप के सामने सब अराजक तत्त्व शान्त होते जाएँगे॥ बिलकुल शान्त होंगे आपकी शक्ति बढ़ेगी अराजक तत्त्व चुपचाप शान्त होंगे॥ समाप्त धीरे-धीरे होंगे एकाएक नहीं होंगे पर आप पर प्रभाव नहीं डाल पाएँगे॥

गोवा के स्वर्गीय मुख्यमन्त्री जो भारत के रक्षामन्त्री भी रहे उनका एक उदाहरण कहीं सुना था॥ पड़ोस में शराबी बहुत तंग करता था कुछ नहीं कर पाते थे॥ जब राजनीति में सफल हुए मुख्यमन्त्री बने वह सारा वातावरण बदल गया, शराबी वही उसकी लत भी वही सब कुछ वही, उसका प्रभाव भी समाप्त हो गया क्यों? क्योंकि अब वहाँ शक्ति थी॥ असुर जो भी भीतर होगा वह अकर्मण्य हो जाएगा यह सिद्धान्त भीतर बाहर दोनों के लिए है और धीरे-धीरे फिर आप उसे निर्मूल भी कर सकते हो॥ यह आत्मपरिष्कार है॥

आत्म विकास - अब इसके बाद समय आ गया है जिसमें साधना को एक नए चरम पर ले जाने का, जिसमें आत्म विकास और आत्म निर्माण होगा॥ विकास और निर्माण में अन्तर क्या है? विकास में जो क्षमताएँ हमारे भीतर जन्मों से आई हैं पिछले जन्मों से; पिछले जन्मों से हम केवल दुर्योधन थोड़ी साथ लेकर आए हैं॥ हमारे साथ केशव भी हैं पाण्डव भी हैं, सभी साथ में आए हैं क्यों नहीं आए हैं? इन्हें भी तो पहचानना है, दुर्योधन को तो पहचान लिया, पर अब हमें पाण्डवों की क्षमता भी तो जाननी है॥ सहदेव की क्षमता, नकुल, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर की क्षमता; अपने भीतर इन सबकी क्षमता भी तो पहचाननी है न? कि मेरे भीतर कौन सी क्षमताएँ पिछले जन्म से आई हैं॥ उन्हें पहचानने के लिए हमें और गम्भीर होकर गहन होना पड़ेगा॥ We shall have to become more serious and perspicacious. हमें अधिक सूक्ष्म दृष्टि चाहिए जिससे हम उनको पहचान सकें॥ मनुष्य को बुराई तो फिर भी चलो दिख जाएगी॥ यह बात सत्य है आप इसे जल्दी से मानोगे नहीं॥ क्योंकि सामान्यत: मनुष्य कहता है मुझमें ये बड़ी खूबियाँ है वे उसकी अपनी हों या न हों, पर वह मानता है॥ किन्तु गम्भीरता से अवलोकन करो तो पता चलता है कि मेरे भीतर यह विशेषता है और मुझे ही नहीं पता; मैं तो बाकी सबको अपनी खूबी मान रहा था॥ सामान्यत: जब हम प्रतिस्पर्धा competition होता है उसमें जो भी सामने खूबी आती है, हम उसी को अपनी बनाना आरम्भ कर देते हैं॥ अपनी नैसर्गिक organic inborne क्षमता है उसे नहीं पहचान पाते॥ अब समय है अपनी उस नैसर्गिक क्षमता, जो जन्म से आई है उस क्षमता को भी हम पहचानें और उसको हम, जितनी आई है उसे हम आगे बढ़ाएँ, विकसित करें, इसीलिए शब्द आया 'आत्म विकास'॥ जो क्षमताएँ भीतर जन्म से आई हैं उन्हें उतना मात्र न रखते हुए अपितु अब उन्हें हम और आगे ले चलें विकसित करें इसके लिए अब और गम्भीर होना पड़ेगा॥ अपनी सजगता को और अधिक बटोरना पड़ेगा॥ जप हम कर रहे हैं, हाँ कर रहे हैं, यह भी तो सजगता बटोरना है॥ निश्चित रूप से है, जप, सजगता बटोरने का बहुत बड़ा माध्यम है॥ हम जप कर रहे हैं ध्यान भी कर रहे हैं बिलकुल, ध्यान भी सजगता बटोरने का बहुत बड़ा माध्यम है; निश्चित रूप से है॥

तो इसके अतिरक्त भी कुछ? हाँ, इसके अतिरिक्त भी कुछ ऐसी साधनाएँ और चाहिए॥ किसलिए ? इसलिए चाहिए क्योंकि हम और अधिक महीन हो रहे हैं, और अधिक सूक्ष्म स्तर पर जाने लगे हैं; और अधिक सूक्ष्म जाने के लिए एकाध साधना जोड़नी पड़ेगी जो हमें और अधिक सूक्ष्मता दे॥ क्या हम उस साधना से अपनी क्षमताओं को पहचानेंगे? नहीं, साधना में तो आप अपने ध्यान को और अधिक सघन करोगे॥ उस प्राप्त सघनता के द्वारा आपकी पहचानने की, भाँपने की, अनुभव करने की क्षमता और विकसित हो जाएगी और आप अपने भीतर आत्म विकास के लिए उन क्षमताओं को पहचान कर फिर उन्हें विकसित करने के लिए उनकी नीति बनाएँगे॥

और आत्मनिर्माण क्या है?
आत्मनिर्माण पर तो मैं अधिक नहीं कहूँगा॥ 'आत्मनिर्माण' यह है कि जो क्षमताएँ मुझमें होनी चाहिए, पर जो मुझमें हैं ही नहीं, मुझमें जन्म से नहीं आई, उनका बीजारोपण मुझे करना है॥ उन क्षमताओं का बीजारोपण मुझमें होना चाहिए॥ something which does not exist, neither has come from the past न पीछे से आई है न मुझमें हैं, पर होनी चाहिए, तो उसके लिए जीवन मिला है न॥ जीवन तो इसी के लिए मिला है कि जो कुछ आया उसमें से खरपतवार हटाओ, अच्छी क्षमताओं को विकसित करो और जो क्षमताएँ नहीं हैं उनका बीजारोपण करो sow the seed ताकि वे इस जन्म से आरम्भ होकर कुछ विकसित हों एवं आने वाले समय में और अधिक विकसित हो जाएँ॥ बात क्षमताओं की है skill की नहीं हो रही, skill can become obsolete पर यह जो भीतर का potential है यह obsolete नहीं हो सकता॥ Obsolete अर्थात जो पुराना हो गया, जो प्रचलन में नहीं है, साहब आज उसका trend नहीं है, आज कौन वह तकनीक प्रयोग करता है? आज वीडियो कैसेट से वीडियो कौन देखता है? अब तो वीडियो कैसेट से वीडियो नहीं देखी जाती, सीडी भी प्रचलन में नहीं है और पेन ड्राइव भी प्राय: समाप्त होता जा रहा है॥ अब तो सब ऑनलाइन होने लगा है, सब फाइल आदि कहाँ रखा है? आकाश में cloud computing में॥ धीरे-धीरे सब बदल रहा है जो कुछ बदलता है वह skill है पर जो क्षमताएँ हैं जो भीतर का potential है उसे हम यहाँ क्षमता कह रहे हैं॥ उसका हम निर्माण करेंगे - आत्म निर्माण॥ कौन सी क्षमताएँ मुझमें और विकसित होनी चाहिए यह भी हमें पहचानना होगा॥

इस पाँच स्तर के प्रशिक्षण में अभी आप तीसरे पर पहुँच पाए हो, आपका आत्म अवलोकन हो गया, आपका आत्मदर्शन हो गया, आपका आत्म परिष्कार हो गया, केवल प्रशिक्षण की दृष्टि से कहा मैंने, जीवन रूपी साधना में कितना हो पाया, उसमें तो अभी समय लगेगा॥ पर आपको ज्ञात हो गया कि what is the curriculum, what is the strategy behind that curriculum, how it is unfolding, कैसे खुल रहा है यह आपको पता चल गया॥

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