आज! त्रिगुणात्मक प्रकृति पर कुछ कहने का मन बना है।

आज! त्रिगुणात्मक प्रकृति पर कुछ कहने का मन बना है।

 


आज! त्रिगुणात्मक प्रकृति पर कुछ कहने का मन बना है। 


कल किसी साधक ने मुझे मेल के द्वारा पूछा था की जब आप कभी आप किसी इसी ऋषि के  नाम का स्मरण करते हैं अथवा किसी ग्रंथ का नाम का स्मरण करते हैं, तो आप उस समय अपने दोनों कानों को क्यों स्पर्श करते हैं। यह क्या है कोई टोटका है? 


साधक के प्रश् का उत्तर मैंने इस प्रकार दिया था, हे साधक इस प्रकार हम अपनी सजगता उस महान विभूति के उल्लेख के समय उस महान ग्रंथ के उल्लेख के समय एक ऊँचे विशिष्ट स्तर को पहुंचाते हैं। हमारी सजगता किसी छोटे स्तर पर ना रह जाए, इसलिए किसी ब्रह्म ऋषि के नाम का उल्लेख! अपने आप को ‘सजग’ कराने के लिए स्मरण कराने के लिए करते हैं।  अपने आप को जताते हैं कि अभी तक जो सामान्य जो बात चल रही थी उसमें अब मुझे अधिक श्रेष्ठ स्तर पर  सजग होना है। इसलिए हम इस प्रकार की भाव भंगिमा करते हैं। मंदिरों में जाकर के भी हम पत्थर को छू कर अपने माथे पर लगाते हो ना....  इसका भी यही अभिप्राय है? We become more aware, more conscious…  कि अब, यह कोई अलग सा वातावरण है, अलग सा उल्लेख है। मुझे अपनी सजगता को एक अलग स्तर पर पहुंचाना है। इसीलिए जब भी कभी ब्रह्म ऋषियों का उल्लेख हो यां आपने कभी संगीतकारों को देखा भी होगा तो वह अपने गुरु का नाम लेते हुए अथवा किसी महान विभूति का उल्लेख करते हुए इसी प्रकार करते हैं। तात्पर्य अधिक स्तर की सजगता को प्राप्त होना ही  है। अध्यात्म का क्षेत्र बाबू सारा सजगता का ही तो है। सजगता को ही बटोरने, सजगता को ही आगे ले चलना है, और सजगता को ही प्राप्त हो कर उच्चतम स्तर की सजगता को प्राप्त कर आत्म साक्षात्कार प्राप्त करना है। 


यह सारा सजगता का खेल है। जो कुछ भी आसपास का अनुभव हो रहा है, तुम्हारे विचारों की अस्थिरता, तुम्हारे भीतर की उहा पोह, तुम्हारे भीतर का कटा बटा स्वरूप सजगता का ही तो खेल है। तुम जब एकाग्र होने की चेष्टा करते हो तो अपनी सजगता को ही बटोरते हो। हमारी सजगता अलग-अलग रंगों में चली जाती है। कभी किसी रंग में कभी किसी रंग में। ऋषियों ने सजगता के तीन रंग बताएं हैं। सतो, रजो एवं तमो।  


सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण होता है। मनुष्य एक ही गुण के प्रभाव में सदा नहीं रहता। कभी कोई तो तो कभी कोई गुण अधिक हावी होता है। कभी-कभी लंबे समय के लिए दो प्रकार के गुणों का प्रभाव भी मनुष्य पर हो जाता है। पर जब एक साधक आध्यात्मिक साधना में आ जाते हैं तब अपने आपको प्रतिदिन ध्यान जैसी अध्यात्मिक क्रियाओं के द्वारा हम अधिक सजगता को प्राप्त होते  हैं। उसके प्रभाव स्वरूप सतोगुण अधिक अंशों में अपना रंग दिखाने लगता है। अन्य दोनों प्रकार के गुणों का प्रभाव  बहुत कम होने लगता है। अगर रजो और तमो का प्रभाव आता भी है तो वह बहुत थोड़े समय के लिए अपना रंग दिखा कर चलता बनता है।  


सतो गुण का प्रभाव जब जीव पर हो तो वह सुख चाहता है। अर्थात सुख की प्राप्ति ही ऐसे में मनुष्य का परम् उद्देश्य रहता है। शांति की प्राप्ति हो, सुख और शांति सतोगुणी की प्राथमिकता है। चूँकि वह उसी को चाहता है, इसीलिए ध्यान में प्राप्त आनंद एवं शांति के सुख को ढूंढता है।  मृग तृष्ण की तरह खोजता है। सतोगुण के प्रभाव में साधक भटकता है की मेरा मन आज नहीं लग पाया। उसे खेद होता है, चिंता होती, क्योंकि सतोगुण जागृत है। उसे जो चाहिए वह अगर नहीं मिला तो खिन्नता और खेद भीतर अनुभव करता है। 


रजोगुण चाहता है क्रिया- अत्यधिक सक्रियता (activity), मुझे कुछ  कुछ करना है और कर के ही रहना है, यह भाव मनुष्य में रजोगुण के प्रभाव से अत्यधिक बना रहता है। उसे इसी में ही आनंद है। 


तमो गुण खतरनाक है । तमो की जीवन में आवश्यकता होते हुए भी उसके खतरे बहुत हैं। उसके खतरे क्या है? तमोगुण मनुष्य के भीतर के ज्ञान पर एक पर्दा डाल देता है। आवरण डाल देता है। A veil upon understanding.  तमोगुण का पर्दा कौन से ज्ञान पर डलता है।  उस ज्ञान पर तमोगुण का पर्दा दल जाता है जो भिन्न-भिन्न विषयों में भिन्न - भिन्न व्यक्तियों में, भिन्न भिन्न परिस्थितियों में भेद करने की मनुष्य की क्षमता है, अर्थात उसकी बुद्धि की क्षमता है, उस पर तमस का पर्दा पड़ जाता है। मनुष्य की भिन्न विषयों में नीर-क्षीर विवेककी बुद्धि पर पर्दा पड़ जाता है। उसकी ability to discern, to distinguish, to discriminate समाप्त हो जाती है। और वह बस मोटे रूप से एक ही बात पर अटक जाता है और हटना ही  ]नहीं चाहता।  एक ऐसा प्रभाव उसके मन पर चढ़ता है कि वह कुछ करने को ही तैयार ही नहीं होता, बल्कि कुछ नहीं करने की अनेक बहाने ढूंढेगा। आलस्य और प्रमाद दोनों आपने सुने हैं। आलस्य शरीर को होता है प्रमाद मन का है. तुम सुबह 4:00 बजे उठना चाहते हो? उठ नहीं पा रहे हो यह आलस्य है। तुम उठना ही नहीं चाहते हो, यह प्रमाद है। आलस्य को थोड़े से प्रयास से हटाया जा सकता है। जबकि प्रमाद को हटाने के लिए साधना चाहिए, तप चाहिए। इसीलिए कहते हैं अनभ्यास अनघड़ता है जो आलस्य है, कोई बात नहीं, इसे दूर किया जा सकना आसान है । पर अगर प्रमाद है, अर्थात मन का प्रमाद है तो कुछ कठिनाई जानना। सामान्यतः इन दोनों शब्दों को एक साथ प्रयोग करते आलस्य-प्रमाद पर दोनों में आकाश और पाताल का अंतर। अगर प्रमाद को हटाने है तो साधना संघर्ष अभ्यास चाहिए। 


तमोगुण क्या करता है ? तमोगुण भीतर के ज्ञान पर, भीतर की बुद्धि की क्षमता पर पर्दा डाल देता है। इसलिए ब्रहम ऋषियों का यह उल्लेख है कि मनुष्य को अपने भीतर चल रहे गुण विषय में और उसके वृद्धि के विषय में सतत ज्ञान रहना चाहिए और आवश्यक परिवर्तन हेतु आभास प्राप्त  प्रयास करते रहना चाहिए। मैं सतोगुण में  रहूं ।   तमोगुण               से अपने आप को जल्दी से जल्दी छुड़ाने की चेष्टा करो। आलस्य है, तो बहुत चिंता मत करो। आलस्य माने तुम करना चाहते हो पर कर नहीं पा रहे और तुम्हे इसका भीतर बहुत खेद है। दिल से खेद है, तुम दिल से दुखी हो। अपनी प्लानिंग के द्वारा, अपने आप से संवाद के द्वारा, अपने आप के साथ अनुशासन की कढ़ाई के द्वारा आलस्य को समाप्त करके मन वांछित अभ्यास को अपना सकते हो। 


और अगर प्रमाद है, अर्थात कोई उपयुक्त कार्य करना ही नहीं चाहते हो पर कहीं से तुम्हारे मन में जागृति आ गई है तो फिर संघर्ष करो।  एक छोटा सा अनुष्ठान कर डालो।  उसके लिए 1100 मंत्रों का अनुष्ठान, 2100 मंत्र का अनुष्ठान, 3100 मंत्रों का लघु अनुष्ठान।  मन में यह संकल्प रहे कि मेरा अमुक  प्रमाद भस्म हो जाए, भस्म हो जाए।  तुम्हारे प्रमाद का दुष्प्रभाव अनेक अंश में समाप्त हो जाएगा।  


श्रीमद भगवद गीता जी के अध्याय 14 के श्लोक नंबर 9 में कही में एक महत्वपूर्ण बात कही गई है। ऋषि कहते हैं “सत्वं  सूखे सञ्जयति” अर्थात सतोगुणी  सुख चाहता है, शांति चाहता है, आनंद चाहता है। “रजःकर्मणि भारत”। रजोगुण कर्म में सक्रियता चाहता है, हे भारत। भारत कौन है।  अर्जुन ही भारत है।  अर्जुन को अनेक नामों से सम्भोधित किया गया है। गुडाकेश, धनञ्जय, परन्तप, कौन्तेय, पार्थ, भारत और अर्जुन। ‘भारत’ अर्थात सदैव श्रेष्ठतम भावनाओं में रमण करने वाला, always immersed in the emotions of highest esteem. अपने राष्ट्र को हमने नाम दिया “भारत”। 


“सत्वं  सूखे सञ्जयति”, “रजःकर्मणि भारत”। ज्ञानम आवृत्य तु तमः, प्रमादे सञ्जयत उत”.   तमोगुण से ज्ञान पर पर्दा पड़ जाता है। प्रमादे सञ्जयत उत, अर्थात प्रमाद है मन का वह भाव जो करना ही नहीं चाहता। इसलिए अपने आलस्य को मैनेज करो कड़ाई से, अनुशासन से औरअपने आप से बात करके, टाइम टेबल बनाकर, टाइम मैनेजमेंट करके। पर अपने प्रमाद को सम्भालो तप  की ऊर्जा से,  कठोर संघर्ष से, सतत अभ्यास से। साधक प्रमाद से हार नहीं मानना है।   प्रमाद आत्मिक उतकर्ष का शत्रु है। यह तुम्हारे पूरे जीवन को खा सकता है। आलस्य कि मुझे इतनी चिंता नहीं वह तुम हटा सकते हो। इसलिए जो साधक कहता है, मैं उठना चाहता हूं। मुझे बड़ा खेद है, 4:00 नहीं उठ पाया। साधक ऐसे में तुम्हें बहुत ज्यादा चिंतित नहीं होता, क्योंकि उसमें जागृति है। उसका आभास भी है। अपने अनघड़ अभ्यास को तो लात मार के किसी दिन भगा डालोगे। और अगर उठने का ही मन ना हो तो-तो वह प्रमाद है 


वह लोग अपने भीतर के रजो और तमो के प्रभाव को साक्षात अपने भीतर अनुभव करते हैं। वह आत्म अवलोकन, आत्म दर्शन के द्वारा मेरे भीतर यह यह दोष है, यह जान पाते हैं । यह प्रमोद का प्रभाव है, इसका बोध प्राप्त कर लेते हैं । यह मन बना पाते हैं की इसे तो मुझे एक बार ही अपने प्रयास से हटाना ही पड़ेगा। उन्हें मैं कहूंगा की करो संकल्प 3100 मंत्रों के जप का।  हैदेखो साधक अगर जीवन में सजगता कम है तो बहुत फर्क पड़ता है। जिस बात के लिए जीवन मिला, वह ही नहीं पूरा हुआ तो क्या पूरा हुआ केवल समय, बस? समय पूरा करने को तो पशु भी आते हैं। मनुष्य की योनि में हम केवल समय तो पूरा करने नहीं आए बाबू, नहीं ना! 


इसलिए जब भी तमो का प्रभाव दिखे तत्काल प्रहार करो उठो और उसे परास्त करो। उसे परास्त करके तुम्हें जो आत्मबल और आत्म संतोष  प्राप्त होगा वह अध्भुत है। Sense of accomplishment.  


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