कौन किसको भजता है ? सतोगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी

कौन किसको भजता है ? सतोगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी

 

कौन किसको भजता है ?


त्रिगुणात्मक प्रकृति पर हम कुछ समय से अपना सत्संग को आगे बढ़ाते जा रहे हैं अतः आज भी त्रिगुणात्मक प्रकृति पर ही सत्संग रहेगा। आज पूजन, उपासना का विषय है।  पूजा का यह विषय है कि कौन - कौन किसको पूजता है और तदनरुप  रूप क्या परिणाम प्राप्त करता है। इसमें हमे सूक्षमता के साथ श्रीमद्भगवद्गीता के प्रकाश के विस्तार समझना होगा। ब्रह्म ऋषि कहते हैं कि सतोगुणी  देव शक्तियों का आवाहन और उनका पूजन इत्यादि करते हैं, जिसमे उनका मूल मन्तव्य आत्म कल्याण अर्थात आत्म उतकर्ष एवं  जनकल्याण हेतु देव शक्तियों से याचना करते हैं।  ‘आत्मनो मोक्षार्थ जगत हिताय’ की  प्रार्थना अपनी पूजा से अपनी उपासना से अपनी झोली फैला कर ईश्वर के समक्ष मांगते हैं। उनकी याचना यही रहती है की मेरा उत्कर्ष हो और अन्य का भी कल्याण हो। मूल बिन्दु यह की सतोगुणी देव शक्तियों कीआराधना करते हैं। 


 ध्यान रहे की यहाँ ब्रह्म ऋषि जो भाव कह रहे हैं  उसे उसी रूप में यथावत व्यक्त नहीं किया है अपितु उनके उठते हुए भाव को यह अध्यापक एक विस्तार प्रदान कर रहा है। ऋषि तो केवल यहीं तक सीमित हो गए कि कौन किसको भजता है, कौन किसकी पूजा करता है। हालाँकि इसी विषय पर कुछ विस्तार आगे अगले श्लोकों में सामने आएगा।  ऊपर हमने जाना की सतोगुणी देव शक्तियों की आराधना करते हैं उनसे आत्म कल्याण, आत्म परिष्कार आत्म परिशोधन और जन कल्याण मांगते हैं 


वहीं दूसरी और रजोगुणी वृत्ति के जीवों के विषय पर श्रीमद भगवत गीता कहती हैं कि वह यक्ष और राक्षसों की उपासना करते हैं, पूजा करते हैं, आराधना करते हैं। यक्ष और राक्षस का तात्पर्य है ऐसी अनेकों अन्य योनियां जो सूक्ष्म अवस्था में तो हैं पर दिव्य नहीं हैं अर्थात दिव्यता से पूरित नहीं है।  उनके पास भी अनुदान वरदान देने की क्षमताएं हैं पर वह केवल स्वार्थ पूर्ति तक सीमित है।  रजोगुणी व्यक्ति जब हाथ उठाकर मांगता है तो यक्ष अथवा राक्षस योनी से अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए झोली फैला देता है। 


तामसिक वृत्ति के जीव के विषय पर श्लोक कहता है कि वह अपनी पूजा उपासना भूत प्रेत इत्यादि की करते हैं और उन्हीं से अपने मनोरथ पूर्ण करने की मनोकामना पूर्ण करने की चेष्टा करते हैं। श्रीमद भगवद गीता का यह श्लोक (अध्याय 17 श्लोक न 4 ) ने केवल  इतना भर कहा, पर इसके आगे एक विस्तार समझना भी आवश्यक है। यह बात तो सत्य है कि सतोगुण वृत्ति का जीव दिव्यता से अर्थात देव शक्तियों से ब्रह्म शक्ति से आत्म कल्याण के लिए झोली फैलाता उपासना आराधना करता और मनोकामना पूर्ति हेतु उनसे मांगता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। 


यहां एक बात और समझनी होगी की देव शक्तियों की उपासना सतोगुणी और रजोगुणी दोनों अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए कर सकते हैं। सांसारिक आवश्यकता, समस्या हेतु व्यक्तिगत मनोकामनाओं की पूर्ति अथवा निवारण हेतु दोनों वृत्ति के जीव देव शक्तियों के समक्ष उपस्थित होते हैं। ऐसे विषय जो उनके अपने जीवन से जुड़े हैं, सांसारिक जीवन से जुड़े  हैं, ऐसी कठिनाई जो उनके जीवन में सामने आकर खड़ी है और आगे का मार्ग ही नहीं सूझ रहा तो वह अपने इष्ट से प्रार्थना करते हैं।  अतः रजोगुणी भी और सतोगुणी भी दोनों अपने इष्ट से अपने सांसारिक जीवन की किसी समस्या के निवारण हेतु भी आराधना करते हैं। आवश्यक नहीं कि रजोगुणी केवल यक्ष अथवा राक्षस योनी की उपासना ही करें। उदाहरण के लिए सतोगुणी वृत्ति का जीव हनुमान जी के समक्ष उपस्थित होकर अपने आत्म उत्कर्ष हेतु मांग सकते हैं, हनुमान जी गायत्री सिद्ध हैं। हनुमान जी के समक्ष आप शरीर बल अथवा अपने किसी संकट के निवारण हेतु  भी उपासना कर सकते हो।  हनुमान जी देव शक्ति है आप अपने किसी जीवन की समस्या निवारण हेतु जो की लौकिक है, पदार्थ से जुड़ी है, व्यापार से जुड़ी है उसके निमित्त उनसे याचना कर सकते हो।  वहीं रजोगुण भी अपनी सांसारिक समस्या के निवारण हेतु हनुमान जी से प्रार्थना - आराधना करते हैं। यह सूक्ष्म भाव अवश्य समझना चाहिए, कहीं ऐसा ना हो की व्यक्ति केवल यह सोच डाले की लौकिक कामनाओं की पूर्ति केवल यक्ष और राक्षस ही मात्र करते हैं। 


हाँ सतोगुणी और रजोगुणी में एक मूल अन्तर अवश्य ही बना रहेगा और वह यह की रजोगुणी सदैव अपने उन्माद में होता है। वह सोचता है की किसी का कुछ बिगड़ता हो तो बिगड़ जाए मुझे उससे कोई लेना देना नहीं बस मेरा काम जैसे भी बने बनना चाहिए। कन्धे पर पैर रख कर चढ़ना पड़े तो विचारणा भी नहीं है। येन - केन प्रकारेण मेरा काम बने। वहीं सतोगुणी कर्म बंधनो का विचार सदैव अपने भीतर रखते हुए अपनी कामना पूर्ति को सर्वोपरि नहीं बनने देता है और अपनी मर्यादा में रहते हुए ही याचना करता है। हानि होने परभी उसे ईश्वरीय विधान मान किसी के साथ अनर्थ की नहीं सोचता।


तमोगुणी वृत्ति के जीव अधोगामी और नीच कामना के होते हैं। अपनी नीचता की पूर्ति के लिए वह भूत प्रेत इत्यादि की सहायता लेते  हैं।  किसी का कुछ भी बेड़ा गर्क करना हो, किसी से कुछ भी छीनना पड़े, किसी के अधिकार में कोई भी अनाधिकृत चेष्टा करनी पड़े करो पर मुझे तो चाहिए, यह तमोगुणी का आचरण होता है। तमोगुणी अनेकों अनर्थ केवल किसी का कुछ बिगाड़ने हेतु करता रहेगा। तमोगुणी वृत्ति का जीव हानि के अतिरिक्त और कोई कामना नहीं कर पता है। 


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