मैं कौन हूँ, स्वयं से पूछा गया यह प्रश्न महाशक्ति के द्वार खोलता।अहंकार की सात्विक महा शक्ति Part 6

मैं कौन हूँ, स्वयं से पूछा गया यह प्रश्न महाशक्ति के द्वार खोलता।अहंकार की सात्विक महा शक्ति Part 6

अहंकार की सात्विक महाशक्ति - भाग 6

अहंकार की सात्विक महाशक्ति - एक ऐसा विषय जिसे बोध के स्तर पर खिलना चाहिए॥ बुद्धि एक सीमा तक ही इसे समझ पाने में सक्षम है पर उसके उपरान्त बुद्धि की सीमाएँ भी समाप्त हो जाती हैं॥ यह बोध के स्तर पर खिलने वाला विषय है॥ अहंकार की सात्विक महाशक्ति, वह विषय जिसे आज तक बिल्कुल एक भिन्न स्वरूप में जाना गया, समझा गया और केवल उससे बचने की चेष्टाओं में ही हम जुटे रहे; उसके सत्य स्वरूप को नहीं समझ पाए॥ अहंकार की सात्विक महाशक्ति, जैसे-जैसे जीव उसके स्वरूप को प्राप्त होता जाता है उसके भीतर से स्वत: ही बहुत कुछ खिलता है॥ अहंकार की सात्विक महाशक्ति को अर्जित करने के लिए जो प्रारम्भ है beginning है वह एक सरल से प्रश्न से ही होती है॥ साधना की विधियाँ अलग हैं निश्चित रूप से हैं, साधना की विधियाँ हैं, विज्ञानमय कोष के अन्तर्गत इसके प्रावधान हैं पर मूल में एक ही है, वह क्या? अपने आप से प्रश्न करना 'मैं क्या हूँ who am I' बस यही मूल है इसका कि मैं क्या हूँ, 'अहं का आकार' वस्तुत: है क्या?

यह प्रश्न, मैं आत्म-साक्षात्कार की बात नहीं कर रहा हूँ, हालांकि वह भी इसी मार्ग से ही होगा जब भी होगा, परन्तु उससे पूर्व बहुत कुछ है, बहुत कुछ है। इस प्रश्न के द्वारा मनुष्य के अस्तित्व में चिपके हुए अनावश्यक संस्कार छिटकने लगते हैं। जो कुछ भी चिपका है चाहे वह किसी जन्म का संस्कार क्यों न हो, किसी प्रकार की कोई कमी क्यों न हो, वासना हो, कोई भय हो, आशंकाएँ हों , लोभ हो, कुछ भी हो। हाँ, अपने व्यक्तिगत जीवन के अनुभव से यह मैं मानता हूँ कि सब कुछ एकाएक नहीं जा सकता, नहीं जाता। पर यह भी निश्चित है कि इस प्रकार के सार्थक प्रश्न के द्वारा उन सबकी पकड़ बहुत ढीली होनी आरम्भ हो जाती है॥ जाएगा नहीं न भय जाएगा, न वासना जाएगी न लोभ जाएगा, ईर्ष्या भी थोड़ी बहुत द्वेष के साथ रह सकती है पर उनके स्वरूप धीरे-धीरे इस प्रकार की साधना से इतने ढीले पड़ जाते हैं कि एक पल आप उनके आक्रमण के अन्तर्गत होंगे चाहे वह वासना का हो, ईर्ष्या का हो, द्वेष का हो, लोभ का हो, किसी बात का भी क्यों न हो, एक पल आप उसके प्रभाव में रहोगे दूसरे पल आप मुक्त हो जाओगे। यह खेल चलेगा, एक पल प्रभाव में दूसरे पल मुक्त हो गए॥ एक पल कहेगा 'हाँ, ऐसी की तैसी करनी है', दूसरा पल कहेगा 'क्या करना है!'

जो पूर्व में नहीं था वह परिवर्तन होता है। जैसे-जैसे यह जीव यदा-कदा अपने आप से पूछता है 'मैं आखिर हूँ क्या? कौन हूँ मैं? क्या मैं ओढ़ी हुई पहचान हूँ? इकट्ठी कर रखी है? किसलिए?'। किसी अन्य के सामने मैं ढह कर न गिर जाऊँ, अपने आप को बटोर कर रखूँ अन्यथा मुझे कुछ समझेंगे ही नहीं, जानेंगे नहीं मुझे। इसलिए मुझे सबको बटोर कर रखना है और यह कई बार आवश्यक भी होता है ॥ लोकाचार की दृष्टि से कई बार यह आवश्यक भी होता है क्योंकि नासमझों की दुनिया में कई बार बहुत समझदारी के नियम कार्य नहीं करते हैं॥ नासमझों की दुनिया में कई बार उनके अनुरूप के नियम ही कार्य करते हैं। अत: कई बार जो कुछ आसपास है उसका अनुसरण भी एक सीमा तक करना पड़ जाता है॥ मैं व्यवहारिक जीवन की बात कर रहा हूँ, मैं न योगी हूँ न सन्यासी हूँ, मैं एक छोटा सा अध्यापक हूँ। सामान्य जीवन जीते हुए जो मैंने अनुभव किया मैं उसका उल्लेख करता हूँ। सामान्य जीवन जीते हुए आसपास की नासमझी से भरी दुनिया में पूरी समझदारी से जीवन नहीं जिया जा सकता, बाबू॥ कुछ कुछ मूर्खताएँ ओढ़नी भी पड़ती है पर जो नित्य प्रति अपने आप से यह पूछता है, खंगालता है मैं क्या हूँ? कौन हूँ मैं? वह भले ही नासमझों की दुनिया में नासमझी के साथ ही रहे पर भीतर एक लौ जगती है समझदारी की, एक प्रज्ञा जागृत हो जाती है, जो उसे बाहर की दुनिया में आचरण व्यवहार तो कराती है वैसा ही जैसा चल रहा है, पर लिप्त नहीं होने देती; short of indulgence, engagement होता है indulgence नहीं। व्यवहार होता है लिप्त नहीं होता। अत: यह एक सार्थक प्रश्न है जिसे विज्ञानमय कोष में साधना की विधियों द्वारा आगे विकसित करते हैं॥ उसका औचित्य तो यह होता है कि हम धीरे-धीरे सारी ओढ़ी हुई पहचान को गिरा दें और जो शुद्ध आत्म तत्त्व है धीरे-धीरे वह परिलक्षित होना आरम्भ हो जाए जो पहले से है॥

पर हम विज्ञानमय कोष की साधना न भी करें तो भी केवल सामान्य जीवन में ही यदा-कदा अपने आप से पूछा गया यह प्रश्न, सामान्यत: हम यह प्रश्न नहीं पूछते कि मैं क्या हूँ॥ हम यह पूछते हैं 'मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?' बात लगभग एक सी ही है, थोड़ा सा अन्तर है कोई विशेष अन्तर नहीं है। 'मुझे जीवन में करना क्या है? मैं क्यों आया हूँ? क्यों आई हूँ?' ये प्रश्न भी लगभग वही हैं जैसा मैंने कहा 'मैं क्या हूँ?'। जैसे-जैसे मनुष्य, एक साधक अपने आप से यह बार-बार पूछता है 'मैं करने क्या आया हूँ?', वह सारी ओढ़ी पहचान छिटक कर गिर जाती है, भले ही थोड़े समय के लिए गिरे फिर आ जाती है॥ यह खेल जब तुममें आरम्भ हो जाए तो यह इस बात का अनुमोदन है कि तुम्हें अब आत्म उत्कर्ष अपनी पकड़ में ले चुका है॥ अब नहीं बचोगे अब आत्म उत्कर्ष होकर रहेगा॥ कब होगा? नहीं जानते पर होकर रहेगा॥

अहंकार की सात्विक महाशक्ति का जागरण, इस प्रश्न के बार बार अपने भीतर दोहराते चले जाने से होना आरम्भ होता है। महाशक्ति का जागरण अर्थात संशय समाप्त स्पष्टता प्रत्यक्ष; जब संशय समाप्त स्पष्टता प्रत्यक्ष हो तो सब होने लगता है, सब कुछ होने लगता है। वह सब कुछ जो होना चाहिए, वह नहीं जो तुम चाहो॥ चाहत की तो कोई सीमा ही नहीं है पर वह सब कुछ जो होना चाहिए, इसमें बहुत बड़ा भेद है। अहंकार की सात्विक महाशक्ति जागृत होते ही, वह नहीं होता जो तुम चाहते हो, वह होता है जो होना चाहिए॥ जो होना चाहिए वह, हमारी चाहत के कई बार विपरीत भी होता है। चाहत तो बाहर से प्रभावित है न? मेरी हो या तुम्हारी हो हम सबकी, पर जो होना चाहिए वह अलग है उत्कर्ष हेतु।

इसीलिए प्रार्थना करते समय एक विशेष बात अपने इष्ट से अवश्य कहनी चाहिए, (मैं अहंकार की सात्विक महाशक्ति पर बोल रहा हूँ), अपने इष्ट से एक विशेष बात अवश्य कहनी चाहिए, हे मेरे इष्ट! हे मेरे गुरू! मेरी एक न चले, (मेरी, मेरी कौन? मैं वाली मेरी। 'मैं' कौन? वह जो ओढ़ी हुई पहचान है अनावश्यक भी है), मेरी एक न चले, बस वही हो जो मेरे उत्कर्ष हेतु होना चाहिए॥ एक में, मेरी एक न चले अर्थात अहंकार का मलिन स्वरूप मेरी एक न चले चाहत समाप्त, बस वही हो जो मेरे उत्कर्ष हेतु हो यह है सात्विक अहंकार; दोनों एक ही प्रार्थना में परस्पर साथ-साथ दोहराए जाते हैं। हे इष्ट! मेरी एक न चले बस वही हो जो मेरे उत्कर्ष हेतु आवश्यक है अर्थात जो मेरी चाहत है वह नहीं, जो होना चाहिए वह हो। एक साथ परस्पर पूछी गई कही गई प्रार्थना 'मैं कौन हूँ?' का मार्ग प्रशस्त करती है कहीं अन्तर्मन में, let me say it subconscious mind अर्द्धचेतन मन में कह देते हैं, कहीं अर्द्धचेतन मन में ये गहरी जड़ें प्रतिष्ठित हो जाती हैं कि चाहत भले ही माया से प्रभावित हो, संस्कारों से प्रभावित हो, वातावरण परिवेश से प्रभावित हो, पर इसके भीतर की तड़प, इसके भीतर का आर्तनाद केवल उत्कर्ष चाहता है॥ अब केवल यह नहीं कि दिल है कि मानता नहीं, अब आत्मा है कि वह बुझेगी नहीं। दिल माने या न माने, दिल तो बहुत बातों से प्रभावित प्रचलित (दिल की बात कर रहा हूँ, मैं अध्यात्मिक हृदय की बात नहीं कर रहा हूँ वह अलग विषय है वहाँ तो जीवात्मा है, मैं प्रचलित दिल की बात कर रहा हूँ प्रचलित दिल),

दिल माने न माने पर आत्मा अब बुझने वाली नहीं, बुझने वाली अर्थात उसका प्रकाश, आत्मा तो नित्य है अर्थात उसका जिस रूप में अब प्रगटीकरण होने वाला है वह रुकेगा नहीं। अहंकार की सात्विक महाशक्ति अपनी पहचान को अपने इष्ट में विलय कर देने की है॥ इष्ट कौन? जो उच्चतम उद्देश्य है जो सर्वोपरि उद्देश्य है!

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