भाव की सामर्थ्य

भाव की सामर्थ्य

 

भाव की सामर्थ्य 
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अनेकों वर्ष पूर्व मुझे स्मरण है की एक प्रदर्शनी में एक विचित्र मशीन को देखने का अवसर प्राप्त हुआ जिसमे बिना किसी स्त्रोत के भी वह जल प्रदान करती थी।  देखने वाले सभी उसे देख कर विस्मृत हो जाते और आगे पीछे घूम घूम कर उसके पीछे जल का स्त्रोत ढूंढ़ते।  दर्शक अपने अविश्वास को समाप्त करने हेतु मशीन को आगे पीछे करते और खोजते के कहीं जल का स्त्रोत नीचे तो नहीं है। पूर्ण पुष्टि कर लेने की पश्चात भी मन मानने को तैयार नहीं होता की इस प्रकार का कोई वैज्ञानिक चमत्कार आज सम्भव हो चुका है। पर हमारे सामने था और उसके पीछे कार्य करने वाली तकनीक भी बताई जा रही थी की यह मशीन वातावरण में से नमी अर्थात Moisture को लेकर जल रूप प्रदान करती है। सिद्धांत और उदाहरण स्पष्ट और हमारे समक्ष पर फिर भी अविश्वास था की जल्दी से छटने को तैयार ही न था। 

यह उपरोक्त उदाहरण हमारे आज के लेख के विषय से पूरी तरह से जुड़ता है।  अदृश्य जगत की अद्भुत क्षमताओं में सर्वोपरि 'भाव' की क्षमता है।  भाव न दिखने के कारण उसकी सत्ता और सामर्थ्य के विषय पर मनुष्य विश्वास नहीं कर पाता है, यहां तक की यह विषय हमारे विचारने में भी नहीं आता है। ब्रह्म ऋषियों का कथन है की अध्यात्म जगत की शक्तियों में भाव की सामर्थ्य सर्वोपरि जनि गई है। साधक इसकी क्षमता पर आधारित होकर अनेको ऐसे कार्य करने में समर्थ हो जाता है जिसे अन्यथा कर पाना कल्पनाओं से भी परे की बात प्रतीत होती है। 

जैसे विचार मस्तिष्क से उतपन्न जाने जाते हैं उसी प्रकार भाव हृदय से उद्भासित जानते हैं।  आधुनिक विज्ञान इस तथ्य का भली प्रकार से अनुमोदन करता है की हृदय से उठने वाली चुंबकीय तरंगो की क्षमता मस्तिक्ष से उठने वाली चुंबकीय तरंगों से हजारो गुना अधिक हैं।  हालाकिं आधुनिक विज्ञान इस विषय पर पूर्णतः अनिभिज्ञ है की हृदय की शक्तिशाली चुंबकीय क्षमताओं से क्या कुछ किया जाना सम्भव है। वास्तविकता यह है की हमारे पूरे जीवन की लीला का साम्राज्य मस्तिष्क पर ही मात्र आधारित होने के कारण हम हृदय से पूर्णतः कटे हुए हैं।  शरीर के अंग एवं कविताओं में अलंकारिक वर्णन के अतिरिक्त इसकी सामर्थ्य का हमे अभी कोई बोध नहीं है। जबकि प्राचीन भारतीय मनीषा ने इसकी सामर्थ्य को जान कर अपने ज्ञान विज्ञान के उच्चतम सोपान को उसी पर ही आधारित किया। 

जैसे जैसे साधक को भाव की सामर्थ्य पर विश्वास और कुछ अधिकार प्राप्त होने लगता है और उसके फलस्वरूप जीवन में अपने अथवा अन्य के लिए परिवर्तन उत्पन्न करने की क्षमता आने लगती है , वैसे वैसे साधक प्रारब्ध कर्म को छोड़ कर बाकि क्षेत्रो में सार्थक एवं सृजनात्मक हस्तक्षेप कर पाने में समर्थ होने लगता है। जप और ध्यान जहां एक तरफ शब्द एवं एकाग्रता पर आधारित हैं वही इन दोनों को ऊंचाई की सामर्थ्य देने का कार्य साथ में भाव की क्षमता भी करती है। 

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