आध्यात्मिक सफलता चाहने वालो, कुछ रजोगुण मुट्ठी में संभाल कर रक्खो

आध्यात्मिक सफलता चाहने वालो, कुछ रजोगुण मुट्ठी में संभाल कर रक्खो

 

अध्यात्म के पथ पर आने वाले साधक के लिए एक विचित्र सी समस्या उत्पन्न होनी आरंभ हो जाती है। जो कुछ भी अब मैं कहने जा रहा हूं उसका उल्लेख किसी ग्रंथ में नहीं है। जो कुछ भी कहा जाएगा वह मेरे व्यक्तिगत अनुभव से ही कहा जाएगा। किसी ग्रंथ का उल्लेख नहीं। कल के सत्संग के विषय को हम कुछ दिन आगे अब निरंतर आगे बढ़ाएंगे।  बड़ा विस्तृत विषय है, त्रिगुणात्मक प्रकृति। गुण से प्रेरित कर्म, कर्म से प्रेरित परिणाम, मनुष्य को निश्चित रूप से इन तीनों गुणों में से, जिसमें सत्व रज तम आते हैं। इन तीनों में से विशेषकर तमोगुण से तो मुक्ति प्राप्त करने के लिए पूरी चेष्टा करते रहनी चाहिए।  आहार में, विहार, में विचार में तमो से मुक्ति हर प्रकार से  होनी ही चाहिए। पर अध्यात्म पथ के साधक को एक लंबे समय तक अपनी सजगता और बुद्धिमत्ता से अपने रजोगुण को संभाल कर, रजोगुण अर्थात रजस अर्थात  एक्शन, एक्टिविटी काइनेटिक्स। इस रजोगुण को उसे संभाल कर रखना आवश्यक है। उसे निरंतर कम करते जाना अवश्य है पर पूर्णतः त्यागना नहीं है। जो अध्यात्म पथ के साधक को ‘आत्मनो मोक्षार्थ जगत हिताय च’ ही को लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ना चाहिए। सतोगुण का विकास ही आरम्भ में परम लक्ष्य होना चाहिए। अनेक साधक अपने भीतर के रजोगुण को पूर्ण त्यागने के लिए आतुर हो जाते हैं ,उन्हें आरंभ में अपने व्यवहारिक जीवन में बाहरी स्तरों पर  बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता। यह सब मैं अनुभव से बोल रहा हूं ग्रंथ से नहीं। बाहर की दुनिया तो बदली नहीं है। और ना ही वह बाहर की दुनिया आप के अनुरूप बदलने वाली है। बाहर की दुनिया आप के अनुरूप बदले भी तो क्यों और किसलिए बदले ? आपकी बहरी दुनिया में सभी की अपनी स्वतंत्र व्यक्तिगत यात्रा है। आप आत्म उतकर्ष की अपनी यात्रा आरंभ कर चले हैं। आप ईश्वर अनुकम्पा से अब अध्यात्म मार्ग में साधना हेतु, आत्म उतकर्ष हेतु आगे बढ़ गए हो। आपकी प्राथमिकताएं अब सतोगुण की ओर झुक चुकी है। अब आपको रजोगुण भाता नहीं है, उससे अब आप मुक्ति चाहते हो और वह मुक्ति प्राप्त करनी भी है। 


पर आप मान्यवर एक बात भूल रहे हो की जिस बाहर के इस संसार में तुम अभी जीवन जी रहे हो, तुम्हें उसके साथ लोकाचार, आदान-प्रदान, व्यवहार इंटरपर्सनल रिलेशनशिप, कम्युनिकेशन, ट्रांजैक्शन यह सारे शब्द ले लो, यह सारे अभी चलने हैं भाई। इसलिए आवश्यक है कि रजोगुण से अभी अपने आप को जोड़ कर रखा जाए। आपके अपने आसपास ही ऐसे बहुत से लोग होंगे जो अति निकट है और आपके सामने ही उन्हें आपकी आध्यात्मिक रूचि पसंद नहीं। आपका उठना और उठ कर साधना करना उन्हें पसंद नहीं। आप कोई आध्यात्मिक विचार उनके सामने अपनी साधना से प्रेरित होकर रखते हो, तो वो सुनिश्चित करते हैं कि गर्दन नीचे लगा कर रख छोड़ी जाए। इसलिए हे साधक बहुत विचार करना है. कहीं तो सतोगुण की आवश्यकता है तो कहीं रजोगुण की आवश्यकता है। सामान्य दायित्व के निर्वाह हेतु कई बार दूसरे से भी अनुशासन का पालन कराना पड़ता है।  दूसरे से भी अनुशासन पालन कराना आपकी अपनी जिम्मेदारी होती है। वह भले  परिवार में माता या पिता होकर हो, यां कहीं व्यवसाय में कोई अधिकारी अधिष्ठाता होकर हो। ऐसे में केवल सतोगुणी शब्दों पर आधारित होकर सभी के साथ, प्रत्येक परिस्थिति में क्या चल पाएगा ? नहीं चलेगा नहीं चलेगा बाबू नहीं चल पायेगा। इसलिए रजोगुण को बचा कर रक्खो।  रजोगुण के माध्यम से बाहर की आवश्यकता अनुरूप मर्यादित स्वरूप में निर्वाह करते चलो। और सतोगुण की वृद्धि से अपने भीतर की क्षमता विकसित करो। बाहर से अपने प्रति आने वाले प्रतिकारों को सहन करने की क्षमता विकसित करो। और इस Inner endurance को अर्थात अपनी सहन क्षमता को सतो के विकास द्वारा विकसित करो। छोटी-मोटी बात तुम्हें जो अभी तक तुम्हें बेध जाती है, दुखी कर जाती है कष्ट कारक पीड़ा दे जाती है। वह धीरे-धीरे कम होनी चाहिए। 


मान लीजिए किसी को कोई बात सहज रूप से समझ आने वाली ही नहीं है पर अनुशासन की दृष्टि से उसे मनवाना आवश्यक है तो ऐसे में क्या आप केवल मीठे मीठे शब्दों का परिचय दोगे। नहीं आपको रजोगुण के प्रभाव की उग्रता लानी ही होगी। और वह रजोगुण का व्यवहार आपके अपने ऊपर (अंतःकरण) प्रभाव नहीं होने दे यह भी सुनिश्चित करना होगा। रजोगुणी आचरण केवल परिस्थिति संभालने हेतु ओढ़कर मात्र नाटक करते हुए… जिससे बाहर की परिस्थिति संभाली जाए बस और तुम्हारा अपना भीतर का आपा प्रभावित ना हो।  भीतर का आपा प्रभावित किए बिना रजोगुण का प्रयोग अध्यात्म पथ पर आए हुए उस साधक को बड़ी सतर्कता से करना है।  जिसकी प्राथमिकता अब आहार विवाह बिहार विचार व्यवहार में सतोगुण है उन्हें अब अपना रजोगुण का मसाला बचा के रखना है। 


यह अध्यापक उस विचार का पक्षधर नहीं है की सतोगुणी को केवल पिटना है।  सतोगुण का तातपर्य अदम्य साहस, प्रचंड आत्मिक ऊर्जा है। अध्यात्म की उर्जा प्राप्ति के  साधक को अब बड़ी बुद्धिमत्ता से, बड़े विवेक के साथ तमोगुण से तो मुक्ति प्राप्त कर रजोगुण को आहार-विहार विचार व्यवहार में केवल मुट्ठी भर संभाल के रखना है की आवश्यकता पड़ने पर जेब से निकालो और प्रयोग करो। अन्यथा सामान्य लोकाचार तुम नहीं कर पाओगे। 


रजोगुण के प्रयोग से लगभग मुक्ति (अगर पूरी तरह से नहीं भी तो ) धीरे-धीरे वह अवस्था विकसित होगी, अभी एकदम नहीं हो सकता है। उस अवस्था को आने में हो सकता है अभी 3 साल और लग जाएं। जब ऐसी स्थिति बने कि अब तुम्हें रजोगुणी व्यवहार की आवश्यकता ही नहीं पड़े।  तुम्हारे सतोगुणी आचरण का प्रभाव इतना प्रबल होगा, इतना प्रबल होगा कि 90% स्थितियां स्वतः ही संभल जाएँगी।  बाहर के लोग तुम्हारे अनुरूप बहुत हद तक विशेष रूप से तुम्हारे लिए, बदल चुके होंगे। और सभी के लिए वह नहीं भी बदलें पर तुम्हारे लिए बदल चुके हों। उस परिस्थिति को आने में 3 साल अथवा कुछ अधिक समय भी लग सकता है।  साधक आप अपनी सहनशीलता विकसित करो, धारक क्षमता विकसित करो, करुणा और दया विकसित करने के लिए मना नहीं किया जा रहा है।  यहाँ तुम्हे केवल एक बात समझाई गई है की सतोगुणी होने का तातपर्य पिटना नहीं है। बाहर की परिस्थिति बाबू जैसी है उसके अनुरूप उसे हैंडल करो (बहुत अच्छा शब्द अंग्रेजी का हैंडल करो) संभालो जब तक बाहर के लोग विशेष रूप से तुम्हारे लिए 90% बदल नहीं जाते हैं। अगर ऐसा नहीं करोगे तो बार-बार दुखी होगे, बार-बार हतोत्साहित हो जाओगे, बार-बार पीड़ित होते रहोगे और कहोगे यह क्या मैं अध्यात्म पथ पर आ गया- आ गई की अब मुझे दुख ही दुख है। मुश्किल से एक डेढ़ घंटा ध्यान के आनंद का उसके बाद साढ़े 22 घंटे दुख। कभी कोई आकर कुछ कह जाता है तो कभी कोई आकर के नज़ला मुझ पर गिरा जाता है। अरे बाबा मैं कहां फस गया - फस गई। इसलिए साधक रजोगुण को थोड़ा बचा के रक्खो। 


रजोगुण का प्रयोग समय-समय पर करो, और सतोगुण पर समझौता मत होने देना समझ गए।  एक बात गांठ बांध लो की पिटना नहीं है, हाँ तुम्हे अधिक सहज होना है, अधिक शांत होना है।  वही  घटनाक्रम जो पहले तुम्हें 10 दिन प्रभावित करती थी अब 10 मिनट से आगे नहीं जानी चाहिए। ज्यादा ज्यादा एक घंटा और उसके बाद आत्मनो मोक्षार्थ को याद करो और अपने स्व भाव में स्व भाव में स्व भाव में (3 बार कहा गया है ) अपने भीतर के सतो के आनंद में चले जाओ। अपने भीतर के उस एकांत में, उस अंतःकरण की गुफा में घुस जाओ।  और जब विकट परिस्थिति सामने हो तो उस समय निर्णय करो, की क्या मुझे चुप रहना है, शांत रहना है, यां रजोगुण का प्रयोग करते हुए मुझे इसका उत्तर भी देना है। यह निर्णय अपने विवेक पर आधारित होकर स्वयं करो। शुरू शुरू में लोग कहेंगे बड़ा भक्त बना बैठा है।  4:00 बजे उठकर के ध्यान साधना और बाद में जवाब तो अभी पटक पटक के दे रहे हो - दे रही हो। याद रखना वह सूत्र जो वेदों से आया है जिसका उदघोष स्वामी विवेकानंद महाराज जी ने भी अपने जीवन में किया है। 


जब तुम कोई बड़ा दुस्साहसी कार्य कोई बड़े उद्देश्य के लिए आगे निकलते हो तो लोग क्या करते हैं। लोग सबसे पहले कुतर्क करते हैं, और बड़ी criticism करेंगे। कहेंगें सब कुछ बेकार है जी, ऐसे ही तमाशे तमाशे हैं, कुछ बकवास चाहिए यह तो इनकी आदत है। यह सभी कुछ कहने वाले का क्या पता की संस्कारों को बदलने के लिए कमरतोड़ कवायत करनी पड़ती है। और अगर उनके इस प्रकार के कांटेदार शब्दों से आप प्रभावित नहीं मानोगे और साधना करते चले जाओगे तो फिर अगला कदम क्या वह करेंगे।  वही लोग तुम्हारा उपहास करेंगे, मजाक उड़ाएंगे।  कहेंगें अभी लो अभी रात शुरू भी नहीं हुई कि इनका सोने का टाइम हो गया।  तुम इस पर भी अगर प्रभावित नहीं हुए तो वही व्यक्ति जो आज तुम्हारे लिए कुतर्क कर रहा है, उपहास कर रहा है, वही व्यक्ति किसी तीसरे को कहता हुआ सुनाई देगा।  “अरे तनाव में ध्यान से बड़ा आराम मिलता है, तुम भी 4:00 बजे उठकर ध्यान कर लो” .  यह क्या हुआ ? यह अब तुम्हारी तुम्हारी प्रशंसा हुई।  


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